रविवार, 28 अक्टूबर 2012

कब तक चुप रहूँ



देखता हूँ अन्याय
और सहता हूँ जुल्म
गूंगा नहीं हूँ
फिर भी चुप रहता हूँ,

हर तरफ कोहराम है
चौराहे पर बिक रहा ईमान है
अंधा नहीं हूँ
फिर भी आँखें बंद रखता हूँ,


दर्द से चीख रहे हैं
परिंदे, पर्वत, पेड़-पौधे
सुन रहा हूँ चित्कार
फिर भी बहरा बना रहता हूँ।

नफरत के सौदागर
कत्ल करने पर आमाद हैं
इंसानियत का
फिर भी अनजान बना रहता हूँ,

लुट रही है आबरू किसी की
तो बिक रहे हैं जिस्म कहीं
कहने को इंसान हूँ
फिर भी तमाशबीन बना रहता हूँ,

कब तक चुप रहूँ
कब तक सहूँ
पशुओं की तरह जीता रहूँ
या अब इंसान बनूँ।















सोमवार, 27 अगस्त 2012

आम आदमी



सुबह के इंतज़ार मे
गुजरती है हर रात
हर सुबह फिर से ले आती है
अनगिनत चिंताओं की सौगात,
फिर से डरा सहमा सा
गुजारता हूँ दिन किसी तरह
छुपता हूँ मकान मालिक से
और सुनता हूँ ताने बीवी के,
हर सुबह निकलता हूँ घर से
बच्चों की फीस और
रासन की चिंता लिए
और दिन ढले फिर से
खाली हाथ लौट आता हूँ,
जीने की जद्दोजहद मे
और रोज़मर्रा की जरूरतों मे उलझा
मैं एक आम आदमी 
बिता देता हूँ
आँखों ही आँखों मे सारी रात,
इस आस मे
कि कल तो होगी
एक नयी सुबह  
जब मैं बच्चों को
बाज़ार ले कर जाऊंगा,
और बीवी को
एक नयी साड़ी दिलवाऊंगा,
एक नयी सुबह के इंतज़ार मे
गुजरती है हर रात मेरी
मैं हूँ एक आम आदमी। 

शनिवार, 25 अगस्त 2012

कोकराझार



कल फिर शहर बंद रहेगा
दंगों के विरोध मे
रैली और धरना होगा
कुछ खद्दरधारी भाषण देंगे
और फिर अगले दिन
जनजीवन सामान्य होगा,
यूँ ही
मृतकों के परिजन रोते रहेंगे
दंगे और विरोध प्रदर्शन होते रहेंगे,
यूँ ही
हमारी सरकार
कान मे रुई डालकर सोती रहेगी,
ना जाने कब
ये सरकार जागेगी
और शहर मे अमन चैन होगा,
ना जाने कब
दंगों का ये सिलसिला थमेगा,
ना जाने कब
ये आँसू थमेंगे  
और ये शहर फिर से हँसेगा,
ना जाने कब
ये काली रात बीतेगी
और एक नयी सुबह होगी,
ना जाने कब  .......    

सोमवार, 20 अगस्त 2012

प्रकृति



ये पर्वत ये झरने
ये पेड़ पौधे ये पक्षी
सभी मुझे 
अपने से लगते हैं,
जब नजदीक जाता हूँ इनके
नाम ले ले कर मेरा 
पुकारते हैं सभी 
और स्नेह की वर्षा 
करते हैं मुझ पर 
और मैं भावुक हो कर 
भीगता हूँ इनकी स्नेहवर्षा मे 
जब भी उदास होता हूँ 
तो हवा के झोंके 
थपकियाँ देते हैं 
और सभी पक्षी मिलकर 
मेरे लिए 
खुशियों के गीत गाते हैं 
और तब मैं 
भावविभोर हो उठता हूँ
कृतज्ञ हूँ ईश्वर का 
जिसने हमें 
इतना कुछ दिया जीने को। 

सोमवार, 2 जुलाई 2012

दिव्य प्रेम




प्रेम व्यापक है
सर्वव्यापी है प्रेम, 
तुम्हारे और मेरे 
हृदय की गहराइयों मे 
सिर्फ और सिर्फ 
प्रेम ही तो है,
तुम्हारा और मेरा 
स्वभाव है प्रेम 
प्रेम ही भक्ति 
प्रेम ही ईश्वर है
शाश्वत सत्य है प्रेम,
शब्दों से परे है 
चेतना का आधार है प्रेम  !
  

सोमवार, 4 जून 2012

आज फिर से




आज फिर से
उठ रही है
सीने में दर्द की इक लहर,


आज फिर से
आँखें नम हो रही है
और दिल उदास है,


आज फिर से
माथे पर सलवटें है
और चेहरे पर विषाद है,


आज फिर से
मेरी भावनाओं से
खेला जा रहा है,


आज फिर से 
मेरे ज़ज्बातों को
कुचला जा रहा है,


आज फिर से
कोई सपना
टूट कर बिखरता जा रहा है,


आज फिर से
मैं खुद से दूर
हुए जा रहा हूँ,


आज फिर से..... 

गुरुवार, 31 मई 2012

आवारा बादल - 2




आवारा बादल हूँ मैं 
कभी यहाँ तो कभी वहाँ 
बरसता रहा, 

लेकिन अब 
मरुभूमि पर बरसने की 
चाहत है
बरसूँ कुछ इस तरह 
कि खिल उठे फूल 
रेगिस्तान में 
और जलती हुई रेत
शीतल हो जाये, 

आवारा बादल हूँ मैं    
मेरी फितरत है 
भटकने की ,

लेकिन अब 
हवाओं से लड़ना है मुझे
जो ले जाती है अक्सर 
मुझे उड़ा कर 
कभी यहाँ तो कभी वहाँ,

आवारा बादल हूँ मैं
बरसना है मुझे 
बंजर जमीन पर
जिसे इंतज़ार है मेरा। 

NILESH MATHUR

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