रविवार, 28 अक्टूबर 2012

कब तक चुप रहूँ



देखता हूँ अन्याय
और सहता हूँ जुल्म
गूंगा नहीं हूँ
फिर भी चुप रहता हूँ,

हर तरफ कोहराम है
चौराहे पर बिक रहा ईमान है
अंधा नहीं हूँ
फिर भी आँखें बंद रखता हूँ,


दर्द से चीख रहे हैं
परिंदे, पर्वत, पेड़-पौधे
सुन रहा हूँ चित्कार
फिर भी बहरा बना रहता हूँ।

नफरत के सौदागर
कत्ल करने पर आमाद हैं
इंसानियत का
फिर भी अनजान बना रहता हूँ,

लुट रही है आबरू किसी की
तो बिक रहे हैं जिस्म कहीं
कहने को इंसान हूँ
फिर भी तमाशबीन बना रहता हूँ,

कब तक चुप रहूँ
कब तक सहूँ
पशुओं की तरह जीता रहूँ
या अब इंसान बनूँ।















5 टिप्‍पणियां:

  1. कब तक चुप रहूँ
    कब तक सहूँ
    पशुओं की तरह जीता रहूँ
    या अब इंसान बनूँ।

    ....बहुत सुन्दर और सटीक अभिव्यक्ति...दिल को छूती रचना..

    जवाब देंहटाएं
  2. hum sab yahi tho karte hain.....bass chup...gehri rachna....soochne par majboor karti rachna

    जवाब देंहटाएं
  3. यह कविता पढ़कर ऐसा लगा जैसे किसी अपने की चुप चीख सुन रहा हूँ। शब्द भारी नहीं हैं, लेकिन असर बहुत गहरा है। प्रकृति से लेकर इंसान तक का दर्द एक ही साँस में सामने आ जाता है। सबसे मजबूत बात “फिर भी बना रहता हूँ” है, क्योंकि यही हमारी सबसे बड़ी सच्चाई है।

    जवाब देंहटाएं

NILESH MATHUR

यह ब्लॉग खोजें

www.hamarivani.com रफ़्तार