शनिवार, 20 जुलाई 2019

रावण हूँ मैं



अहंकारी हूँ
क्योंकि पुरुष हूँ मैं 
सदियों से अहंकारी रहा है पुरुष 
और कायम रहेगा ये अहंकार सदा,
रावण से मेरी तुलना 
कर सकते हो तुम 
लेकिन मेरा वध करने के लिए 
तुम्हे राम बनना होगा,
और राम बनने का सामर्थ्य 
तुममे भी नहीं है
राम तो छोड़ो 
हनुमान भी नहीं बन सकते तुम
जो मेरी लंका को जला सके,. 
मुझ जैसे असंख्य रावण 
इस धरा पर हर ओर हैं
इंतज़ार है तो सिर्फ राम का 
पता नहीं कब वो आएँगे  
और मुझे और मेरे अहंकार को मारेंगे। 



शुक्रवार, 19 जुलाई 2019

जागो उठो




जागो उठो
देखो सवेरा हो गया है
पंछी गा रहे हैं
फूल खिलने लगे हैं,

अँधेरी रात बीत गयी
अब रौशनी में नहा लो
और अंतर के मैल को धो कर
स्वच्छ निर्मल हो जाओ,

अब तैयार हो जाओ
तुम्हारा ही इंतज़ार है
नियति तुम्हारी राह देख रही है
तुम्हे अपनी मंज़िल पर पहुंचना है,

अब समय आ गया है
ये सोचने का
कि तुम क्यों आये थे
और क्या करना है,

बहुत अनमोल है ये जीवन
द्वार पर कोई दस्तक दे रहा है
और तुम चादर ओढ़ कर सोये हो
उठो अब भी समय है,

उन दीवारों को गिरा दो
जिनमे तुम कैद हो
हर उस ज़ंज़ीर को तोड़ दो
जिसमे जकड़े हुए हो,

उठ कर बाहर निकलो
देखो कुछ भव्य सा
तुम्हारी सोच से परे कुछ अद्भुत
तुम्हे दिखाई देगा,

तुम दुखों के सागर में
या फिर क्षणिक आनंद में उलझे हो
वहाँ सर्वत्र सुख ही सुख है
उस भव्यता से
तुम अचंभित रह जाओगे,

अब भी समय है
उठ कर द्वार खोलो और निकल पड़ो
अपने गंतव्य की ओर
जहां जाने के लिए तुम आये 


शुक्रवार, 17 अगस्त 2018

दूर कहीं खो जाना है





ये जो उलझनें हैं जीवन की 
मुझे इनके पार जाना है
कुछ पाने की चाहत है 
कही दूर खो जाना है,

थक चुका अब तन 
और भटक रहा है मन
वो कौन सा है पथ
जहाँ मुझे जाना है और मंज़िल को पाना है,

जीवन मरण के इस चक्र से 
अब मुक्त हो जाना है
फिर नहीं आना है 
दूर कहीं खो जाना है, 

अब तक चला जिस पथ 
उस से पार जाना है 
काँटों भरी हो राह 
या फिर फूल बिछे हों
अब नहीं घबराना है 
दूर कहीं खो जाना है
दूर कहीं खो जाना है//

मंगलवार, 26 सितंबर 2017

हुंकार




हमने भी खून बहाया कुछ तुमने भी बलिदान दिया 
तब जाकर मिली हमें फिरंगियों से आज़ादी,
भगत सिंह ने फंदा चूमा तो असफाकउल्ला भी शहीद हुए हुए
क्या हिंदु मुस्लिम करते हो कुछ इंसानियत के काम करो, 
पाकिस्तान को मारो गोली अब हिंदुस्तान की बात करो
पडोसी अगर बदमाश है तो  मिलकर उसपर वार करो.
ज़िंदा दफना दो उनको जो अफ़ज़ल की अब बात करे 
दीवारों में चुनवा उनको  जो  सेना पर अब पथराव करे.
गला काट दो उनका जो भारत माता को बदनाम करे
चीर के रख दो उनको अब जो हाफिज सईद की बात करे. 
आँख फोड़ दो उनकी जो बुरी नज़र से कश्मीर को देखे
पाकिस्तान को दिखला दो अब क्या उसकी औकात है  
हाफिज सईद का सर काटकर लालकिले पर टंगवा दो,
हमने भी खून बहाया कुछ तुमने भी बलिदान दिया 
आओ मिलकर हुंकार भरें जब दुश्मन ने ललकारा दिया।

बुधवार, 29 जून 2016

लौट कर आऊँगा

ध्यान, साधना, सत्संग 
से कोसों दूर
कंक्रीट के जंगल में
सांसारिक वासनाओं 
और अहंकार तले
आध्यात्म रहित वनवास
भोग रहा हूँ इन दिनों,
मैं फिर से लौट कर आऊँगा 
जानता हूँ की तुम मुझे 
माफ करोगे 
और सहर्ष स्वीकार भी करोगे। 

बुधवार, 15 जून 2016

लिखने के लिए बाज़ुओं में ताक़त चाहिए और जिगर भी..




लिखने के लिए 
बाज़ुओं में ताक़त चाहिए और जिगर भी,
वर्ना कलम तो हरेक के पास है।
खाली जा सकता है वार तलवार का 
और बंदूक की गोली भी दे सकती है धोखा 
पर बहुत गहरा है वार कलम का 
सीधे जिगर पर वार करती है कलम ,
बंदूक थामी है तुमने 
तो जरूर तुम्हारे बाजुओं में 
ताक़त होगी और जिगर भी, 
फिर क्यों बन्दूक हाथ में ले रखी है तुमने 
कलम ही काफ़ी है इनके लिए 
जिनसे तुम लड़ रहे हो।  


शुक्रवार, 14 अगस्त 2015

विभाजन की त्रासदी


आज एक पुरानी रचना फिर से.......


एक मुल्क के सीने पर
जब तलवार चल रही थी
तब आसमाँ रो रहा था
और ज़मी चीख रही थी,


चीर कर सीने को
खून की एक लकीर उभर आई थी
उसे ही कुछ लोगों ने
सरहद मान लिया,

उस लकीर के एक तरफ
जिस्म
और दूसरी तरफ
रूह थी,

पर कुछ इंसान
जिन्होंने जिस्म से रूह को
जुदा किया था
वो होठो में सिगार
और विलायती वस्त्र पहन
कहकहे लगा रहे थे,

और कई तो
फिरंगी औरतों संग
तस्वीर खिचवा रहे थे,

भगत सिंह को
डाकू कहने वाले
मौन धारण किये
अनशन पर बैठे थे,

शायद वो इंसान नहीं थे
क्योंकि विभाजन की त्रासदी से
वो अनजान नहीं थे!
NILESH MATHUR

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