आवारा बादल हूँ मैं, कभी यहाँ तो कभी वहाँ, भटकना ही तो फितरत है मेरी.....
शनिवार, 14 जनवरी 2012
सूर्य की पहली किरण
वो सूर्य की पहली किरण बन मेरे घर के आँगन में आए और जाड़े की एक ठंडी सुबह मुझे जी भर के अपनी किरणों से नहलाया , और मैं सुनहरी किरणों के सौन्दर्य से सराबोर हो कर फूलों की तरह खिल उठा और शायद अब इन्ही फूलों की तरह महकता रहूँगा एक सदी तक ।
sunder samarpit bhaav .. ...
जवाब देंहटाएंवाकई ....
जवाब देंहटाएंशुभकामनायें भैया !
bahut sundar bhaav ukerti prastuti.
जवाब देंहटाएं.
जवाब देंहटाएंबहुत ख़ूबसूरत , सादर.
कृपया मेरे ब्लॉग पर भी पधार कर अपना स्नेहाशीष प्रदान करें
अहसास कुछ ऐसे ही होतें हैं ..ता-उम्र साथ रहते हैं ...
जवाब देंहटाएंआमीन
जवाब देंहटाएंबहुत ही अच्छी...
जवाब देंहटाएंमुबारक हो !
जवाब देंहटाएंकल 17/01/2012 को आपकी यह पोस्ट नयी पुरानी हलचल पर लिंक की जा रही हैं.आपके सुझावों का स्वागत है .
जवाब देंहटाएंधन्यवाद!
बहुत सुन्दर..
जवाब देंहटाएंबहुत ख़ूबसूरत ,
जवाब देंहटाएंसुन्दर
जवाब देंहटाएंबिल्कुल सच कहा है आपने प्रत्येक पंक्ति में ..आभार इस बेहतरीन प्रस्तुति के लिये ।
जवाब देंहटाएंखूबसूरत सोच ..
जवाब देंहटाएंsundar bhav,sundar rachana...
जवाब देंहटाएंSundar rachna ....
जवाब देंहटाएंमेरे भी ब्लॉग में पधारें और मेरी रचना देखें |
मेरी कविता:वो एक ख्वाब था