बुधवार, 6 मार्च 2013

प्रकृति



ईश्वर अगर तुम हो कहीं 
तो सो जाना ओढ़कर चादर वहीं 
तुमने जो सृष्टि रची
उसका नाश कर रहे हम
सर्वत्र विनाश कर रहे हम 
मत देखना नेत्र खोलकर 
इसका जो हाल कर रहे हम। 

मंगलवार, 15 जनवरी 2013

प्रगति के पथ पर



साभार गूगल 
नदियों का रुख मोड़ कर
पहाड़ों को भेद कर बिजली बनाएँगे 
बस्तियों को उजाड़ कर 
इमारतें बनाएँगे 
खेतों की जगह 
कारखाने बनाएँगे 
इन पहाड़ों, नदियों, खेतों, बस्तियों 
और समूची प्रकृति को रौंद कर

प्रगति के पथ पर
बढ़ना है,
क्या ये संभव है?? 

सोमवार, 7 जनवरी 2013

कहाँ थे ये मर्द अब तक




एक दामिनी के मरने पर
इतने मर्द पैदा हुए
कि हिल गया हिंदुस्तान
कहाँ थे ये मर्द अब तक
कहाँ थे...
कहाँ थे...
कहाँ थे अब तक ।  

वो बहाते हैं हम पी जाते हैं




उनके पसीने कि कमाई
हम खाते हैं
वो बहाते हैं हम पी जाते हैं
वो दो वक़्त की रोटी को
तरस जाते हैं
और हम पिज्जा बर्गर खाते हैं। 

शनिवार, 5 जनवरी 2013

गज़ल




हथौड़ी और छेनी की टंकार
है संगीत उनके लिए
और हम हाथों मे जाम लिए
गज़ल सुनते हैं। 


गुरुवार, 27 दिसंबर 2012

अब के बरस


आए साल का स्वागत कुछ क्षणिकाओं से ......... 
(1)
साँप अब 
डसना छोड़ दो 
नया साल आ रहा है। 
(2)
सुन लो दुनिया वालों 
हिंदुस्तान मे 
और रक्त नहीं बहेगा 
अब के बरस। 
(3)
सावधान 
कसाब के आका 
और नहीं सहेंगे  
अब के बरस। 
(4)
फिज़ा मे बारूद नहीं 
फूलों की महक होगी 
इस साल। 
(5)
ना हिन्दू हैं हम 
ना मुसलमान 
हम हैं हिन्दुस्तानी 
और ये है हिंदुस्तान। 

रविवार, 23 दिसंबर 2012

ज़ख्म


क्षणिकाएँ .......
(1)
ज़िन्दगी ने दिए थे जो ज़ख्म 
उन्हें सहलाता रहा 
पीता रहा दर्द और जीता रहा 
शुक्रिया उनका 
जिन्होंने मरहम की 
और उनका भी शुक्रिया 
जिन्होंने मेरे ज़ख्मों को कुरेदा।

(2)
ऐ मेरे खुदा 
हर ख़ता के लिए 
माफ़ करना मुझे 
मैं होशो हवाश में न था 
जब मैंने ख़ता की।

(3)
हुश्न वाली ने 
खंज़र छुपा रखा था बगल में 
मुझे ज़िन्दगी से 
मौत ज्यादा खूबसूरत लगी।

(4)
रात इतनी लम्बी हो गयी 
कि सुबह के इंतज़ार में 
ज़िन्दगी बीत गयी।





NILESH MATHUR

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