मंगलवार, 15 जून 2010

प्रेम क्या है?

एक सवाल.........


प्रेम क्या है?
धोखा, फरेब या वफ़ा है,
या किसी की रगों में बहता
नशा है!

25 टिप्‍पणियां:

  1. बस वो गीत याद आ गया..
    ''प्यार को प्यार ही रहने दो... कोई नाम ना दो...''

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  2. ... प्रेम को प्रेम ही रहने दें कोई नाम ना दें...!!

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  3. नमस्ते,

    आपका बलोग पढकर अच्चा लगा । आपके चिट्ठों को इंडलि में शामिल करने से अन्य कयी चिट्ठाकारों के सम्पर्क में आने की सम्भावना ज़्यादा हैं । एक बार इंडलि देखने से आपको भी यकीन हो जायेगा ।

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  4. नीलेस बाबू!! आप त तत्वप्रश्न छोड़ दिए हैं... इसका कोई एक जवाब नहीं है...केतना लोग के लिए ‘सिर्फ एह्सास है ये रूह से महसूस करो’ है और केतना लोग के लिए ‘एक आग का दरिया है और डूब के जाना है’ वाला बात है!!

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  5. प्रेम माता पिता से किया जाए तो भक्ति है..
    प्रेम देश और मातृभूमि से किया जाए तो पूजा है...

    प्रेम तो अनन्त है नीलेश भाई.... सच्चाई यही है अनन्य प्रेम ईश्वर का रुप है और वही शान्ति का पर्याय भी।

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  6. प्रेम 'प्रेम' के सिवा और कुछ नहीं है

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  7. प्यार .... कहते , सुनते एक नशा सा होता है
    जिसकी फितरत बदल जाये---वह प्यार नहीं है

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  8. प्रेम तो एक 'अनुभूति' है भाई, नाम इसका 'अनुराग' है भाई.
    इस अनुराग के रूप अनेक..., देखना चाहो.. देख .लो भाई.

    हां प्रेम तो एक अनुराग है भाई, यह अनुराग फिर राग से जुड़ कर,
    भाव और समीकरण बदलकर, मूल्य बदलता रहता है, मेरे भाई.

    शिशु के साथ है 'वात्सल्य', नाम .इसी ..अनुराग का,
    बालक के संग जुड़ जाता जब, 'स्नेह' यही अनुराग है.

    साथी के संग जुड़ता है जब, .'.प्रेम' ..यही ..अनुराग है.
    ज्येष्ठो के संग है 'अभिवादन', और श्रेष्ठों के संग 'श्रद्धा' है.

    मातु - पिता और गुरुजन के संग, 'भक्ति' ..यही अनुराग है.
    बन जाता 'समर्पण भाव' यह, जब मंदिर मस्जिद तो जाता है.

    'आशीर्वाद' के रूप में सौ-गुणित, मिलता वापस यही अनुराग है,
    हो भाव का तेल, विश्वास की बत्ती, फिर तो यह अखंड चिराग है.

    वह अनुराग बन जाता देखो, 'दिव्य - धवल - उज्जवल प्रकाश' है.
    अब खुला हुआ है अन्तरिक्ष, ....और ...खुला हुआ....आकाश है.

    अपनी -अपनी झोली है ये, कौन समेट पाता है कितना?
    जितनी बड़ी पात्रता जिसकी, वह समेट पाता है उतना.

    दोष नहीं कहीं कुछ इसमें, नहीं कहीं.. कोई ..धब्बा ...है.
    करते धूमिल खुद हम इसको, जब होश नहीं सब गड्ढा है.

    'नफरत-इर्ष्या', 'राग-द्वेष' सब, नकारात्मक अनुराग की खाई है,
    कैसे पाटोगे ..तुम ....इसको.., ...क्या कोई ..युक्ति .....लगाईं ...है?

    अनुराग से ही फिर भर सकता यह, चाहे जितनी चौड़ी खाई हो.
    फिर तुम चुप क्यों....बैठे मेरे भैया?, क्यों ....अब देर ...लगाईं है .

    प्रेम तो एक 'अनुभूति' है भाई, नाम इसका 'अनुराग' है भाई.
    इस अनुराग के रूप अनेक..., देखना चाहो.. देख .लो.. ...भाई.

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  9. तक कोई इस बात का जवाब नही दे सका ... प्रेम क्या है ... शायद बस एहसास है ...

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  10. प्रेम क्या है?
    धोखा, फरेब या वफ़ा है,
    या किसी की रगों में बहता
    नशा है!
    yeh sawal bhi muskil hai or jabaab ko samajhna bhi.

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  11. हर एक का अपना नजरिया है, कि प्यार क्या है ?


    मेरे हिसाब से एक खूबसूरत एहसास.....

    शुभकामनाएं.....

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  12. प्यार एक सुन्दर एहसास जो व्यक्ति के व्यक्तित्त्व को निखारता है एक अच्छी सोच प्रदान करता है।

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  13. प्रेम खुदा है .....उसकी इबादत उतनी ही पाक और साफ होनी चाहिए जितनी खुदा की ....!!

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  14. जिसके मन में जैसे भाव, उसने वही प्रेम को समझा।
    ---------
    क्या आप बता सकते हैं कि इंसान और साँप में कौन ज़्यादा ज़हरीला होता है?
    अगर हाँ, तो फिर चले आइए रहस्य और रोमाँच से भरी एक नवीन दुनिया में आपका स्वागत है।

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  15. धोखा, फरेब, नशा नहीं प्रेम वो हकीकत है जि‍से आम आदमी नहीं जानता पर सबको उसके लक्षण बताता है, क्‍या ऐसा नहीं है ? हम लोग हर चीज को परि‍भाषा में चाहते हैं, पर प्रेम को परि‍भाषि‍त करना कि‍सी भी भाषा के बस की बात नहीं दि‍खती।

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  16. prem dhai akshsar ka wo shabd hai jo padhne se vyakti pandit hota hai ,aur galat disha jaane se dandit ,aur na samjhi me khandit .prem ek samvendana hai ......likhne ko prem par bahut kuchh hai kyonki yah dard bhi hai dava bhi ,jahan kuchh na ho bayan.sundar rachna .

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  17. लीजिये विद्वत्त जनों ने तो प्रेम की अनगिनत परिभाषाएं दे दी ,मैं तो सिर्फ कविता की तारीफ़ कर सकती हूँ

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NILESH MATHUR

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