Friday, May 6, 2011

पिछड़ा हुआ गाँव

वो कहते हैं की
तुम्हारा गाँव 
आज भी पिछड़ा है 
मैं बोला 
सच कहा तुमने  


वहाँ आज भी लोग 
सिर्फ सच बोलते हैं,


वहाँ पीपल की 
पूजा होती है
ब्राह्मणों को 
भोजन कराते हैं,

गोबर की थेपड़ीयों पर
वो लोग रोटी बनाते हैं
और जमीन पर बैठकर
खाते हैं,

अपनों से बड़ों के 
वहां पाँव छूते हैं
आज भी वहां लोग
रिश्तों में उलझे हैं,

डैडी को बाबु जी
और मम्मी को माँ कहते हैं 
और तो और 
पड़ोस के बुड्ढे को
काका कहकर बुलाते हैं लोग, 

वहां के गंवार लोग
अब भी 
दूसरों के दुःख में 
आंसू बहाते हैं
और अपना 
तन मन धन 
व्यर्थ ही लुटा देते हैं, 

पिछड़ी हुई औरतें हैं वहां
जो पूरा तन ढकती हैं 
और पति को 
परमेश्वर कहती हैं,


वहां आज भी लोग
छत पर लेटकर
तारों को
देखते हैं ,


सौंधी सौंधी मिट्टी है
गोबर लिपे मकान
और फूट चुके आँगन में
तुलसी का है थान,


सच कहा भाई 
बहुत पिछड़ा है 
आज भी 
हमारा गाँव!
  

10 comments:

  1. वाह …………किन लफ़्ज़ो मे कविता की खूबसूरती बयाँ करूं……………अति सुन्दर्।

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  2. जहां इतना प्रेम बरसता हो वो पिछडा हुआ कैसे हो सकता है। ये तो आज की मानसिकता पिछडी हुई है।

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  3. वो कहते हैं की
    तुम्हारा गाँव
    आज भी पिछड़ा है
    मैं बोला
    सच कहा तुमने


    वहाँ आज भी लोग
    सिर्फ सच बोलते हैं,
    ... aankhen chamak rahi padhke

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  4. कौन कहता है तुम्हारा गाँव पिछड़ा है , बहुत बारीकी से गाँव का अध्ययन किया आपने सुन्दर रचना शुभकामनायें ...

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  5. वाह ! बेहद खूबसूरती से कोमल भावनाओं को संजोया इस प्रस्तुति में आपने ...

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  6. वाह, कितना सुंदर है आपका यह गाँव, हम सभी को ऐसे ही गाँव की तलाश है !

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  7. पिछड़ा होकर भी सबसे आगे सा लग रहा है गांव आपका । इसमें ठहराव है ,संस्कार है,मान्यतएं हैं और शाश्वत जीवन है ।

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  8. काश ऐसा गाँव हर कोस पर हो , जहाँ इतने शुभ संस्कारों वाले रहते हैं ।

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  9. neelesh ji
    bahut hi sndar aurbahut bahut hi badhiya aapki prastuti.sach aaj jamana badal raha hai to logon ke vichr bhi to usi tarah badlenge .lekin gaon to gaon hi hai jahan apnapan pyaar sukh-dukh sab milkar ek saath bantte hain jaha ke sanskar aaj bhi jivit hain .ye baate shari logoki samajhse pare hain koun ki logo ke jivan jis tarahpaiso kihod lagi hai jiske liye vo sab kuchh bhule baithe hai .unke liye gaon ke neemyapeepr ki chhanv lene ki fursat kahan jaha do pal vo chain se baith kar apni thakan ko dur kar saken.
    aap aise hi rchnaye likha kariye jisse yah yah ahsas ho ki hamare sanskaar khtm nahi hue hai balki shahar se hat kar gaon me teji se fail rahe hain .
    aanand aa gaya aapki is kavita ko padhkar .
    bahut bhaut bdhai vhardik dhanyvaad sahit
    poonam

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  10. क्या कहें ..बहुत सुन्दर..

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NILESH MATHUR

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