Friday, November 1, 2013

कबाड़ी की कविता



कबाड़ी हूँ 
खरीदता हूँ बेचता हूँ 
लेकिन शब्दों को 
सहेज कर रखता हूँ
उन्हें तराश कर 
एक नयी शक्ल देने का 
प्रयास करता हूँ ,
मेरा व्यवसाय भी सहायक है मेरा 
कभी कभी हथोड़े की आवाज 
और मजदूर का पसीना भी शब्द देते हैं मुझे 
इंसान का पिघलना तो नहीं लेकिन 
लोहे का गलना अक्सर देखता हूँ,
ट्रक के घूमते  पहिये में 
जीवन की गति देखता हूँ 
और पंचर टायर में  
जीवन का यथार्थ नजर आता है,
टूटे हुए पुर्जों को देखकर
समझ में आता है कि
रिश्तों की तरह 
इन्हें फिर से जोड़ा तो जा सकता है 
लेकिन वो मजबूती फिर नहीं रहती,  
रेल की पुरानी पटरियां 
बताती है मुझे 
कि सहना क्या होता है 
वे घिस तो जाती हैं 
लेकिन टूटना उन्हें नहीं आता, 
छेनी पर हथौड़े की चोट को
और हथौड़ा चलाते हाथों को 
बहुत नजदीक से देखा है मैंने 
मैंने देखी है उन हाथों की मजबूती ,
मैंने देखा है 
उन मजबूत कन्धों को 
जो उठाते हैं खुद से भी ज्यादा भार  
लेकिन झुकते नहीं, 
सचमुच मैं कबाड़ी हूँ 
हर पुरानी चीज की 
कद्र जानता हूँ 
पुराने रिश्तों को निभाता हूँ 
पुराने दोस्तो को पहचानता हूँ,
हाँ मैं कबाड़ी हूँ 
सब कुछ खरीद
और बेच सकता हूँ 


सिर्फ ईमान को छोड़ कर । 

Wednesday, October 30, 2013

क्षणिकाएँ



हुश्न वाली ने
खंजर छुपा रखा था बगल मे
मुझे ज़िंदगी से
मौत ज्यादा खूबसूरत लगी।

एक हुश्न वाली से
तकरार मे बीत गयी जिंदगी
आ अब तो हुश्न ढल रहा है
थोड़ा प्यार करें।

तूने आँखों से
जो पिलाई होती
तो लोग आज मुझे 
शराबी ना कहते। 

हर खता के लिए 
माफ करना मुझे 
मैं होशो हवाश मे न था। 

जुल्म ना कर 
मुझ पर इतना ऐ खुदा 
कि तुझ पर मेरा एतबार ना रहे। 

रात गुजर गयी 
हर बात गुजर गयी 
लेकिन सुबह हुई 
तो आइना भी शरमा रहा था। 

मुझ पर एतबार ना कर 
ऐ दोस्त 
मैं ईमान बेचने की तैयारी मे हूँ।

रात इतनी लंबी थी 
कि सुबह के इंतजार मे 
ज़िंदगी बीत गयी।

ज़िंदगी को जी भर के
जी न सका तो क्या 
कब्र मे जी भर के सोऊँगा। 

ज़िंदगी ने दिये थे जो जख्म 
सहलाता रहा 
पीता रहा दर्द और जीता रहा। 





Wednesday, March 6, 2013

प्रकृति



ईश्वर अगर तुम हो कहीं 
तो सो जाना ओढ़कर चादर वहीं 
तुमने जो सृष्टि रची
उसका नाश कर रहे हम
सर्वत्र विनाश कर रहे हम 
मत देखना नेत्र खोलकर 
इसका जो हाल कर रहे हम। 

Tuesday, January 15, 2013

प्रगति के पथ पर



साभार गूगल 
नदियों का रुख मोड़ कर
पहाड़ों को भेद कर बिजली बनाएँगे 
बस्तियों को उजाड़ कर 
इमारतें बनाएँगे 
खेतों की जगह 
कारखाने बनाएँगे 
इन पहाड़ों, नदियों, खेतों, बस्तियों 
और समूची प्रकृति को रौंद कर

प्रगति के पथ पर
बढ़ना है,
क्या ये संभव है?? 

Monday, January 7, 2013

कहाँ थे ये मर्द अब तक




एक दामिनी के मरने पर
इतने मर्द पैदा हुए
कि हिल गया हिंदुस्तान
कहाँ थे ये मर्द अब तक
कहाँ थे...
कहाँ थे...
कहाँ थे अब तक ।  

वो बहाते हैं हम पी जाते हैं




उनके पसीने कि कमाई
हम खाते हैं
वो बहाते हैं हम पी जाते हैं
वो दो वक़्त की रोटी को
तरस जाते हैं
और हम पिज्जा बर्गर खाते हैं। 

Saturday, January 5, 2013

गज़ल




हथौड़ी और छेनी की टंकार
है संगीत उनके लिए
और हम हाथों मे जाम लिए
गज़ल सुनते हैं। 


NILESH MATHUR

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