Tuesday, September 26, 2017

हुंकार




हमने भी खून बहाया कुछ तुमने भी बलिदान दिया 
तब जाकर मिली हमें फिरंगियों से आज़ादी,
भगत सिंह ने फंदा चूमा तो असफाकउल्ला भी शहीद हुए हुए
क्या हिंदु मुस्लिम करते हो कुछ इंसानियत के काम करो, 
पाकिस्तान को मारो गोली अब हिंदुस्तान की बात करो
पडोसी अगर बदमाश है तो  मिलकर उसपर वार करो.
ज़िंदा दफना दो उनको जो अफ़ज़ल की अब बात करे 
दीवारों में चुनवा उनको  जो  सेना पर अब पथराव करे.
गला काट दो उनका जो भारत माता को बदनाम करे
चीर के रख दो उनको अब जो हाफिज सईद की बात करे. 
आँख फोड़ दो उनकी जो बुरी नज़र से कश्मीर को देखे
पाकिस्तान को दिखला दो अब क्या उसकी औकात है  
हाफिज सईद का सर काटकर लालकिले पर टंगवा दो,
हमने भी खून बहाया कुछ तुमने भी बलिदान दिया 
आओ मिलकर हुंकार भरें जब दुश्मन ने ललकारा दिया।

Wednesday, June 29, 2016

लौट कर आऊँगा

ध्यान, साधना, सत्संग 
से कोसों दूर
कंक्रीट के जंगल में
सांसारिक वासनाओं 
और अहंकार तले
आध्यात्म रहित वनवास
भोग रहा हूँ इन दिनों,
मैं फिर से लौट कर आऊँगा 
जानता हूँ की तुम मुझे 
माफ करोगे 
और सहर्ष स्वीकार भी करोगे। 

Wednesday, June 15, 2016

लिखने के लिए बाज़ुओं में ताक़त चाहिए और जिगर भी..




लिखने के लिए 
बाज़ुओं में ताक़त चाहिए और जिगर भी,
वर्ना कलम तो हरेक के पास है।
खाली जा सकता है वार तलवार का 
और बंदूक की गोली भी दे सकती है धोखा 
पर बहुत गहरा है वार कलम का 
सीधे जिगर पर वार करती है कलम ,
बंदूक थामी है तुमने 
तो जरूर तुम्हारे बाजुओं में 
ताक़त होगी और जिगर भी, 
फिर क्यों बन्दूक हाथ में ले रखी है तुमने 
कलम ही काफ़ी है इनके लिए 
जिनसे तुम लड़ रहे हो।  


Friday, August 14, 2015

विभाजन की त्रासदी


आज एक पुरानी रचना फिर से.......


एक मुल्क के सीने पर
जब तलवार चल रही थी
तब आसमाँ रो रहा था
और ज़मी चीख रही थी,


चीर कर सीने को
खून की एक लकीर उभर आई थी
उसे ही कुछ लोगों ने
सरहद मान लिया,

उस लकीर के एक तरफ
जिस्म
और दूसरी तरफ
रूह थी,

पर कुछ इंसान
जिन्होंने जिस्म से रूह को
जुदा किया था
वो होठो में सिगार
और विलायती वस्त्र पहन
कहकहे लगा रहे थे,

और कई तो
फिरंगी औरतों संग
तस्वीर खिचवा रहे थे,

भगत सिंह को
डाकू कहने वाले
मौन धारण किये
अनशन पर बैठे थे,

शायद वो इंसान नहीं थे
क्योंकि विभाजन की त्रासदी से
वो अनजान नहीं थे!

Sunday, May 10, 2015

माँ



ऐ मेरे खुदा 
माँ के बालों की सफेदी मुझे अच्छी नहीं लगती
उसके चेहरे की झुर्रियाँ मिटा दे
उसका हर ग़म दे दे मुझे 
उसके चेहरे पे मुस्कुराहट सजा दे,
उसी की दुआओं का असर है 
कि गिर गिर के सम्हल जाता हूँ हर बार
जानता हूँ हर वक़्त मेरी फिक्र रहती है उसे,
ऐ मेरे ख़ुदा 
अपनी हर तकलीफ छुपाती है वो 
ज़रूरत होने पर भी कुछ नहीं मांगती 
मुझे बस इतना दे दे 
कि उसकी हर अधूरी खवाहिश को पूरा कर दूँ,
ताउम्र दूर रखा तूने मुझे 
अब जल्द मेरी माँ से मिला दे मुझे। 

Monday, May 4, 2015

मैं मोहताज नहीं तुम्हारा...




हाँ मजदूर हूँ मैं 
हाँ हाँ मजदूर हूँ मैं,
ढाओ सितम 
जितना सामर्थ्य हैं तुममे 
झुका सको जो मेरी पीठ 
इतना सामर्थ्य नहीं तुममे,
हाँ मैं मजदूर हूँ 
हाँ हाँ मजदूर हूँ मैं  
तुम देखो 
मेरे पसीने की हर बूंद 
है तुम्हारी तिजोरी मे,
वक़्त नहीं शायद 
तुम्हारे पास मेरे लिए 
पर याद रखना 
मैं भी मोहताज नहीं तुम्हारा,
तुम जानते हो 
कि तुम्हारा कोई वजूद नहीं मेरे बिना.....
फिर भी आंखे बंद रखते हो,
कभी अगर जाग जाये 
ज़मीर तुम्हारा 
तो अदा कर देना 
हक़ हमारा.....  




Friday, May 1, 2015

मजदूर



बरसती हुई आग में 
अपने वज़न से ज्यादा भार 
पीठ पर लादकर 
मुस्कुराता है वो,
अपने हाथों के छाले 
घरवालों से छुपाता है वो,
बच्चों के साथ 
हँसता है खिलखिलाता है वो,
वो मौजूद है हर तरफ
हमारे इस तरफ हमारे उस तरफ,
लेकिन क्या उसका हक़ 
अदा करते हैं हम??
NILESH MATHUR

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