Sunday, August 11, 2019

चालीस के पार



क्या हुआ जो तुम
चालीस के पार हो गयी हो,

थोड़ी सी झुर्रियां पड़ने लगी हैं
पर उतनी ही खूबसूरत हो तुम अब भी,

तुम्हारे चेहरे पे नूर है
और आँखें नशीली हैं अब भी,

तिरछी नज़रों से देखते हैं
मनचले तुम्हें अब भी,

तुम्हारी खूबसूरती पे
मर मिटने को तैयार हैं कई अब भी,

जब तुम घर से निकलती हो
तो आहें भरते हैं लोग अब भी,

शर्मा जाता है आईना
तुम्हें देख कर अब भी,

क्या हुआ जो तुम
चालीस के पार हो गयी हो,

पहले से ज्यादा
जवान दिखती हो अब भी।




 



Saturday, July 27, 2019

मज़दूर




हथौड़ा चला, चलता रहा
छेनी भी मचलती रही
चोट पर चोट 
माथे से टपकता पसीना,
पर वो हाथ रुकते नहीं
वो हाथ थकते नहीं
जिन्होने थामी है
हथौड़ा और छेनी,
चंद सिक्कों की आस में
अनवरत चलते वो हाथ
आग उगलते सूरज को
ललकारते वो हाथ,
क्या देखे हैं तुमने
कभी ध्यान से वो हाथ??

Saturday, July 20, 2019

रावण हूँ मैं



अहंकारी हूँ
क्योंकि पुरुष हूँ मैं 
सदियों से अहंकारी रहा है पुरुष 
और कायम रहेगा ये अहंकार सदा,
रावण से मेरी तुलना 
कर सकते हो तुम 
लेकिन मेरा वध करने के लिए 
तुम्हे राम बनना होगा,
और राम बनने का सामर्थ्य 
तुममे भी नहीं है
राम तो छोड़ो 
हनुमान भी नहीं बन सकते तुम
जो मेरी लंका को जला सके,. 
मुझ जैसे असंख्य रावण 
इस धरा पर हर ओर हैं
इंतज़ार है तो सिर्फ राम का 
पता नहीं कब वो आएँगे  
और मुझे और मेरे अहंकार को मारेंगे। 



Friday, July 19, 2019

जागो उठो




जागो उठो
देखो सवेरा हो गया है
पंछी गा रहे हैं
फूल खिलने लगे हैं,

अँधेरी रात बीत गयी
अब रौशनी में नहा लो
और अंतर के मैल को धो कर
स्वच्छ निर्मल हो जाओ,

अब तैयार हो जाओ
तुम्हारा ही इंतज़ार है
नियति तुम्हारी राह देख रही है
तुम्हे अपनी मंज़िल पर पहुंचना है,

अब समय आ गया है
ये सोचने का
कि तुम क्यों आये थे
और क्या करना है,

बहुत अनमोल है ये जीवन
द्वार पर कोई दस्तक दे रहा है
और तुम चादर ओढ़ कर सोये हो
उठो अब भी समय है,

उन दीवारों को गिरा दो
जिनमे तुम कैद हो
हर उस ज़ंज़ीर को तोड़ दो
जिसमे जकड़े हुए हो,

उठ कर बाहर निकलो
देखो कुछ भव्य सा
तुम्हारी सोच से परे कुछ अद्भुत
तुम्हे दिखाई देगा,

तुम दुखों के सागर में
या फिर क्षणिक आनंद में उलझे हो
वहाँ सर्वत्र सुख ही सुख है
उस भव्यता से
तुम अचंभित रह जाओगे,

अब भी समय है
उठ कर द्वार खोलो और निकल पड़ो
अपने गंतव्य की ओर
जहां जाने के लिए तुम आये 


Friday, August 17, 2018

दूर कहीं खो जाना है





ये जो उलझनें हैं जीवन की 
मुझे इनके पार जाना है
कुछ पाने की चाहत है 
कही दूर खो जाना है,

थक चुका अब तन 
और भटक रहा है मन
वो कौन सा है पथ
जहाँ मुझे जाना है और मंज़िल को पाना है,

जीवन मरण के इस चक्र से 
अब मुक्त हो जाना है
फिर नहीं आना है 
दूर कहीं खो जाना है, 

अब तक चला जिस पथ 
उस से पार जाना है 
काँटों भरी हो राह 
या फिर फूल बिछे हों
अब नहीं घबराना है 
दूर कहीं खो जाना है
दूर कहीं खो जाना है//

Tuesday, September 26, 2017

हुंकार




हमने भी खून बहाया कुछ तुमने भी बलिदान दिया 
तब जाकर मिली हमें फिरंगियों से आज़ादी,
भगत सिंह ने फंदा चूमा तो असफाकउल्ला भी शहीद हुए हुए
क्या हिंदु मुस्लिम करते हो कुछ इंसानियत के काम करो, 
पाकिस्तान को मारो गोली अब हिंदुस्तान की बात करो
पडोसी अगर बदमाश है तो  मिलकर उसपर वार करो.
ज़िंदा दफना दो उनको जो अफ़ज़ल की अब बात करे 
दीवारों में चुनवा उनको  जो  सेना पर अब पथराव करे.
गला काट दो उनका जो भारत माता को बदनाम करे
चीर के रख दो उनको अब जो हाफिज सईद की बात करे. 
आँख फोड़ दो उनकी जो बुरी नज़र से कश्मीर को देखे
पाकिस्तान को दिखला दो अब क्या उसकी औकात है  
हाफिज सईद का सर काटकर लालकिले पर टंगवा दो,
हमने भी खून बहाया कुछ तुमने भी बलिदान दिया 
आओ मिलकर हुंकार भरें जब दुश्मन ने ललकारा दिया।

Wednesday, June 29, 2016

लौट कर आऊँगा

ध्यान, साधना, सत्संग 
से कोसों दूर
कंक्रीट के जंगल में
सांसारिक वासनाओं 
और अहंकार तले
आध्यात्म रहित वनवास
भोग रहा हूँ इन दिनों,
मैं फिर से लौट कर आऊँगा 
जानता हूँ की तुम मुझे 
माफ करोगे 
और सहर्ष स्वीकार भी करोगे। 
NILESH MATHUR

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