Sunday, May 22, 2011

तुम हो सागर तट

तुम 
सागर तट हो
मैं हूँ इक लहर,
मेरी 
नियति है
तुम्हारी बाहों में समाना
आ कर तुम में
मिल जाना,
मैं 
इक लहर
समर्पण करती हूँ
अपना अस्तित्व तुमको
तुम ही दोगे
मेरे अस्तित्व को 
पहचान,
मैं तो यूँ ही 
मिटाती रहूंगी
अपना अस्तित्व
तुम्हारी बाहों में
सदियों तक!

20 comments:

  1. कही यह मिट जाना आभासी तो नहीं ...
    बहुत सुन्दर रचना

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  2. बहुत सुंदर अभिव्यक्ति , बधाई

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  3. बहुत ही सुन्दर लिखा है अपने इस मैं कमी निकलना मेरे बस की बात नहीं है क्यों की मैं तो खुद १ नया ब्लोगर हु
    बहुत दिनों से मैं ब्लॉग पे आया हु और फिर इसका मुझे खामियाजा भी भुगतना पड़ा क्यों की जब मैं खुद किसी के ब्लॉग पे नहीं गया तो दुसरे बंधू क्यों आयें गे इस के लिए मैं आप सब भाइयो और बहनों से माफ़ी मागता हु मेरे नहीं आने की भी १ वजह ये रही थी की ३१ मार्च के कुछ काम में में व्यस्त होने की वजह से नहीं आ पाया
    पर मैने अपने ब्लॉग पे बहुत सायरी पोस्ट पे पहले ही कर दी थी लेकिन आप भाइयो का सहयोग नहीं मिल पाने की वजह से मैं थोरा दुखी जरुर हुआ हु
    धन्यवाद्
    दिनेश पारीक
    http://kuchtumkahokuchmekahu.blogspot.com/
    http://vangaydinesh.blogspot.com/

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  4. आपकी रचनात्मक ,खूबसूरत और भावमयी
    प्रस्तुति भी कल के चर्चा मंच का आकर्षण बनी है
    कल (23-5-2011) के चर्चा मंच पर अपनी पोस्ट
    देखियेगा और अपने विचारों से चर्चामंच पर आकर
    अवगत कराइयेगा और हमारा हौसला बढाइयेगा।

    http://charchamanch.blogspot.com/

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  5. गुरु कहते हैं हम से सीखो...उसे जीवन में अपनाओ...हम में समाओ मत...
    नीरज

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  6. @नीरज जी, धन्यवाद्, मैं समर्पण की बात कर रहा हूँ, जब तक हम गुरु के प्रति पूर्ण रूप से समर्पित नहीं होंगे तब तक सीखना मुश्किल होता है, यहाँ समाने से मेरा मतलब समर्पण ही है! आभार!

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  7. बहुत सुंदर भावपूर्ण कविता ! शुभकामनाएँ !

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  8. मैं
    इक लहर
    समर्पण करती हूँ
    अपना अस्तित्व तुमको
    तुम ही दोगे
    मेरे अस्तित्व को
    पहचान,

    बहुत सुंदर भावपूर्ण कविता ! शुभकामनाएँ

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  9. बिना समर्पण गुरु को पाना मुमकिन नहीं ..... हर भाव समर्पित हो तभी प्रभु की ज्ञान ज्योति गुरु देते हैं .... निलेश जी बहुत अच्छा लगा, पृष्ठ खुलते शरीर में एक बिजली सी कौंध गई

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  10. चर्चा मंच से आपके ब्लॉग पर आना हुआ.
    सुन्दर भाव, अनुपम प्रस्तुति
    बहुत बहुत आभार.
    मेरे ब्लॉग पर आईयेगा,आपका हार्दिक स्वागत है.

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  11. बहुत सुंदर भावाभिव्यक्ति ....!!

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  12. तुम ही दोगे
    मेरे अस्तित्व को
    पहचान,

    बहुत सुंदर भावपूर्ण कविता ! शुभकामनाएँ

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  13. इक लहर
    समर्पण करती हूँ
    अपना अस्तित्व तुमको
    तुम ही दोगे
    मेरे अस्तित्व को
    पहचान,
    मैं तो यूँ ही
    मिटाती रहूंगी
    अपना अस्तित्व
    तुम्हारी बाहों में
    सदियों तक!bahut hi pyaari gaharai lee hui rachanaa.bemisaal.badhaai aapko.


    plese visit my blog and leave the comments also.aabhaar

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  14. सुन्दर अभिव्यक्ति ……. धन्यवाद

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  15. beautiful posts.
    I have read few.keep posting !!!

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  16. तुम
    सागर तट हो
    मैं हूँ इक लहर,
    मेरी
    नियति है
    तुम्हारी बाहों में समाना
    आ कर तुम में
    मिल जाना,

    इस सुन्दर कविता हेतु आपको बहुत-बहुत बधाई एवं शुभकामनाएं

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  17. लहरों का ये क्रम .. हमेशा चलता रहेगा ... मिटना ही तो जीवन है ...

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  18. "अपना अस्तित्व
    तुम्हारी बाहों में
    सदियों तक!"

    जय गुरुदेव !!!

    न इससे ज्यादा कुछ चाहिए,
    न इससे कम...
    सुन्दर अभिव्यक्ति..!!

    ***punam***
    bas yun...hi..

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  19. शायद आपकी इस प्रविष्टी की चर्चा आज बुधवार के चर्चा मंच पर भी हो!
    सूचनार्थ

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NILESH MATHUR

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