Friday, May 1, 2015

मजदूर



बरसती हुई आग में 
अपने वज़न से ज्यादा भार 
पीठ पर लादकर 
मुस्कुराता है वो,
अपने हाथों के छाले 
घरवालों से छुपाता है वो,
बच्चों के साथ 
हँसता है खिलखिलाता है वो,
वो मौजूद है हर तरफ
हमारे इस तरफ हमारे उस तरफ,
लेकिन क्या उसका हक़ 
अदा करते हैं हम??

4 comments:

  1. वाह बहुत सुन्दर
    बधाई

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  2. विचारणीय प्रश्न...मजदूर दिवस पर शुभकामनायें..

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  3. कहाँ कर पाते हैं हम ऐसा .. किसी भी मद्जूर को कहाँ कर पाता है कोई ...

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  4. बहुत सी सुन्दर कविता, पढ़कर आनन्द आ गया।

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NILESH MATHUR

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