Monday, September 26, 2011

क्षणिकाएँ




(1)
पर्दा करने लगी है 
आजकल शर्म 
बेहयाई 
घूँघट उठा रही है। 


(2)
मैं कोशिश करूंगा 
कि सिर्फ शब्दों के जाल ना बुनू 
शब्दों के परे भी इक जहाँ है 
कभी उधर का भी रूख करूँ। 


(3) 
वो अवरोधों से
बचकर निकल जाते हैं
हमें अवरोधों से बचना नहीं 
उन्हे ध्वस्त करना है।  

(4)
वर्तमान ही भविष्य का 
आधार बनाता है 
अतीत के आँगन मे बिखरे 
सपनों को साकार बनाता है। 

(5)
दर्द को 
सार्वजनिक बना देते हैं आँसू 
और सहानुभूति का पात्र 
बना देते हैं आँसू। 


22 comments:

  1. मैं कोशिश करूंगा
    कि सिर्फ शब्दों के जाल ना बुनू
    शब्दों के परे भी इक जहाँ है
    कभी उधर का भी रूख करूँ।

    बहुत खूब कहा है आपने ।

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  2. सभी क्षणिकाये खूबसूरत्।

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  3. बधाई ||
    खूबसूरत प्रस्तुति ||

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  4. वाह बहुत खूब ........हर शब्द शब्द ....अपने आप में पूर्ण है .....
    --

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  5. दर्द को
    सार्वजनिक बना देते हैं आँसू
    और सहानुभूति का पात्र
    बना देते हैं आँसू।
    भावों की सुंदर अभिव्यक्ति बधाई

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  6. सारी क्षणिकाएँ बेहतरीन

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  7. सभी क्षणिकाये...बहुत खूब

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  8. सुंदर क्षणिकाएं हैं नीलेश जी !
    बहुत समय हो गया संवाद नहीं हुआ अपने बीच … :)



    आपको सपरिवार
    नवरात्रि पर्व की बधाई और
    शुभकामनाएं-मंगलकामनाएं !

    -राजेन्द्र स्वर्णकार

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  9. मैं कोशिश करूंगा
    कि सिर्फ शब्दों के जाल ना बुनू
    शब्दों के परे भी इक जहाँ है
    कभी उधर का भी रूख करूँ....बहुत सुन्दर कहा...

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  10. हर क्षणिका बहुत अच्छी लगी ....कोशिश शब्दों के पार के जहां को जानने की ...

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  11. दर्द को
    सार्वजनिक बना देते हैं आँसू
    और सहानुभूति का पात्र
    बना देते हैं आँसू

    sari bahut acchi hain....par yeh mujhe kuch khas lagi

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  12. एक से बढ़ कर एक.......!!

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  13. सबसे बेहतरीन पहली क्षणिका!

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  14. पर्दा करने लगी है
    आजकल शर्म
    बेहयाई
    घूँघट उठा रही है। .....waah! kya baat hai......

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  15. कल 14/12/2011 को आपकी यह पोस्ट नयी पुरानी हलचल पर लिंक की जा रही हैं.आपके सुझावों का स्‍वागत है, मसीहा बनने का संस्‍कार लिए ....

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  16. बेहतरीन क्षणिकाएँ हैं सर!

    सादर

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  17. सुन्दर क्षणिकाएं...
    सादर..

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NILESH MATHUR

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