Tuesday, September 6, 2011

प्रेमी हूँ मैं



मैंने देखा है
प्रकृति को बहुत नजदीक से
शरीक हुआ हूँ मैं
उसकी खुशियों मे
और महसूस किया है
उसके दर्द को मैंने
हृदय की गहराइयों से,

देखा है मैंने
बारिश मे पेड़ों को झूमते हुए
पौधों को मुस्कुराते हुए
और कोयल को गाते हुए,

देखा है मैंने
कलियों को खिलते हुए
मदहोश हुआ हूँ मैं
फूलों की खुशबू से,

मेरी आँखों ने देखा है
आसमान मे इंद्रधनुष बनते हुए,

पेड़ पौधों के लिए भी
रोया हूँ मैं
महसूस किया है मैंने
धरती का दर्द
और सुना है
पहाड़ों का रूदन भी,

प्रेमी हूँ मैं
इस खूबसूरत प्रकृति का।


15 comments:

  1. प्रेमी हूँ मैं
    इस खूबसूरत प्रकृति का।

    खूबसूरत प्रस्तुति ||
    बधाई ||

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  2. प्रकृति प्रेम से ओतप्रोत आपकी रचना अप्रतिम है...बधाई स्वीकारें

    नीरज

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  3. वाह ..बहुत ही बढि़या ।

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  4. प्रकृति के प्रति आपका प्रेम सराहनीय है| सुंदर रचना, आभार......

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  5. अच्छा लिखा है आपने .....

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  6. सुंदर भाव ! प्रकृति है ही ऐसी सुंदर...

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  7. शरीक हुआ हूँ मैं
    उसकी खुशियों मे
    और महसूस किया है
    उसके दर्द को मैंने
    हृदय की गहराइयों से,...

    Very appealing lines Nilesh ji.

    .

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  8. beautiful post. THis poem touched my heart,
    excellent write!

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  9. प्रेमी हूँ मैं
    इस खूबसूरत प्रकृति का।

    क्या बात है निलेश जी ....
    अब अपने संकलन की तैयारी कीजिये ....

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  10. शरीक हुआ हूँ मैं
    उसकी खुशियों मे
    और महसूस किया है
    उसके दर्द को मैंने
    हृदय की गहराइयों से,...बहुत सुन्दर अभिव्यक्ति...

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  11. पेड़ पौधों के लिए भी
    रोया हूँ मैं
    महसूस किया है मैंने
    धरती का दर्द
    और सुना है
    पहाड़ों का रूदन भी,... tabhi to kuch saansen baki hain

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  12. आपकी पोस्ट आज "ब्लोगर्स मीट वीकली" के मंच पर प्रस्तुत की गई है /आप आयें और अपने विचारों से हमें अवगत कराएँ /आप हमेशा ऐसे ही अच्छी और ज्ञान से भरपूर रचनाएँ लिखते रहें यही कामना है /आप ब्लोगर्स मीट वीकली (८)के मंच पर सादर आमंत्रित हैं /जरुर पधारें /

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  13. jiska hrday prakarti ke har harkat ko mahsoos karta hai vahi sachcha kavi hai.aapki kavita pahli baar padhi bahut pasand aai.aapke blog ko follow kar rahi hoon.apne blog par aane ka nimantran bhi de rahi hoon.

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NILESH MATHUR

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