Thursday, July 28, 2011

वक़्त मिले तो देखना मुझे


ढलते हुए सूरज की 
किरण हूँ मैं
शाम को वक़्त मिले तो 
देखना मुझे !

22 comments:

  1. वाह ...बहुत खूब ।

    ReplyDelete
  2. दो लाइन बहुत कुछ कहती हैं ....
    शुभकामनायें !

    ReplyDelete
  3. दुनिया उगते हुए सूरज को सलाम करती है भाई
    ढलते हुए सूरज के लिए वक्त नहीं है लोगों के पास
    कहते हैं न "सफलता के सौ बाप होते हैं,पर असफलता
    अनाथ होती है"।वक्त शब्द का खुसुरत प्रयोग
    सुन्दर प्रस्तुति।

    ReplyDelete
  4. नीलेश जी
    कैसे हैं ? सब कुशल-मंगल तो है न !


    ढलते हुए सूरज की
    किरण हूं मैं
    शाम को वक़्त मिले तो
    देखना मुझे !

    अच्छे ख़यालात हैं … सुंदर !

    मेरी ग़ज़ल के दो शे'र आपके लिए -
    ख़ौफ़ मेरी आंच से नाहक़ ही क्यों राजेन्द्र है
    शाम का सूरज हूं , थोड़ी देर में ढल जाऊंगा

    मोम हूं , यूं ही पिघलते' एक दिन गल जाऊंगा
    फिर भी शायद मैं कहीं जलता हुआ रह जाऊंगा


    अगर इसे पूरा पढ़ना-सुनना चाहें तो यह रहा लिंक
    शाम का सूरज हूं

    हार्दिक बधाई और शुभकामनाएं !
    -राजेन्द्र स्वर्णकार

    ReplyDelete
  5. गागर में सागर !

    ReplyDelete
  6. बहुत खूब .....!!

    अपनी १०,१२ क्षणिकाएं भेज दीजिये
    संक्षिप्त परिचय और चित्र के साथ ......

    ReplyDelete
  7. वाह बहुत ही सुन्दर
    रचा है आप ने
    क्या कहने ||
    लिकं हैhttp://sarapyar.blogspot.com/
    अगर आपको love everbody का यह प्रयास पसंद आया हो, तो कृपया फॉलोअर बन कर हमारा उत्साह अवश्य बढ़ाएँ।

    ReplyDelete
  8. sabhi rachnayein bahut hi sunder ...........

    ReplyDelete

NILESH MATHUR

Search This Blog

www.hamarivani.com रफ़्तार