Sunday, January 23, 2011

मेरा कुछ सामान (२)



संघर्ष के दिनों की कुछ और रचनाएँ........
(1) मेरा स्कूटर 

मेरा स्कूटर 
हार्ट की बिमारी से 
ग्रस्त है 
लेकिन फिर भी
बेचारा मुझे
खांसते कराहते हुए 
अपनी पीठ पर लिए फिरता है,
सोचता हूँ किसी दिन 
जब जेब हरी भरी होगी
तो इसका भी इलाज 
किसी अच्छे डाक्टर से 
करवाऊंगा! 

(२) मेरा प्यार



मेरा प्यार 
आजकल नाराज है मुझसे
क्योंकि कड़की चल रही है 
इन दिनों,
झगडे की जड़ है
मेरी जेब
जो इजाज़त नहीं देती
तोहफा खरीदने की,
शायद प्यार भी 
मुफ्त में
नहीं मिलता है 
इन दिनों!


(3) मेरा चूल्हा 

मेरा चूल्हा 
जो अक्सर
जलता नहीं
और मैं
तपती धूप में
जलता हूँ,
मुझे जलने कि एवज में
जो मिलता है
मेरे चूल्हे का
दिल
उससे नहीं बहलता, 

जिस तरह 
मैं 
जलकर भी
उसे जला नहीं पता,
वो जलकर मुझे 
भरपेट खिला नहीं पता!


(4) पहली तारीख 


महीने की पहली तारीख  
अक्सर डराती है मुझे 
सपने में नज़र आते हैं मुझे
भयानक शक्ल में 
मकान मालिक, 
बनिया,
और वो महाजन
जिससे मैंने कर्ज ले रखा है,
मेरे दोस्त भी 
इन दिनों  
मुझे देखते ही
नज़रे चुराने लगते है
क्योंकि उन्हें भी
मैं बता चुका हूँ
सपने के बारे में,
हर दिन 
इक उम्मीद लिए
घर से निकलता हूँ
और नाउम्मीदगी को 
साथ लिए 
वापस आ जाता हूँ
और फिर से 
रात भर सपने में
मकान मालिक,
बनिया, 
और महाजन को देखता हूँ!









22 comments:

  1. एक मध्यम वर्गीय परिवार की स्तिथी का बहुत प्रभावी चित्रण..बहुत सुन्दर

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  2. आपकी रचनात्मक ,खूबसूरत और भावमयी
    प्रस्तुति भी कल के चर्चा मंच का आकर्षण बनी है
    कल (24/1/2011) के चर्चा मंच पर अपनी पोस्ट
    देखियेगा और अपने विचारों से चर्चामंच पर आकर
    अवगत कराइयेगा और हमारा हौसला बढाइयेगा।
    http://charchamanch.uchcharan.com

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  3. baat to sabme hai , per yah sabse juda hai...


    महीने की पहली तारीख
    अक्सर डराती है मुझे
    सपने में नज़र आते हैं मुझे
    भयानक शक्ल में
    मकान मालिक,
    बनिया,
    और वो महाजन
    जिससे मैंने कर्ज ले रखा है,
    मेरे दोस्त भी
    इन दिनों
    मुझे देखते ही
    नज़रे चुराने लगते है
    क्योंकि उन्हें भी
    मैं बता चुका हूँ
    सपने के बारे में,
    हर दिन
    इक उम्मीद लिए
    घर से निकलता हूँ
    और नाउम्मीदगी को
    साथ लिए
    वापस आ जाता हूँ
    और फिर से
    रात भर सपने में
    मकान मालिक,
    बनिया,
    और महाजन को देखता हूँ!

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  4. जीवन के यथार्थ संघर्ष को बयान करती ...मन को अंतर तक स्पर्श करती रचनाएँ ..कोटि कोटि अभिन्दन....

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  5. नीलेश भाई!
    निर्जीव वस्तुओं में आपने जीवन संचार किया है शब्दों के माध्यम से.. वास्त्व में यह दोनों की व्यथा है उस निर्जीव वस्तु की भी और उस सजीव मनुष्य की भी जो उससे जुड़ा है और उसकी व्यथा में बराबर का सहभागी है!!

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  6. संघर्ष के दिनों की याद ..और मेरा सामान ...बहुत भावपूर्ण रचनाएँ

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  7. भावुक कर दिया आपकी इस रचना ने ।

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  8. एक आम आदमी के जीवन के यथार्थ को प्रदर्शित करती कविता ...
    सुन्दर !

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  9. मेरा स्कूटर
    हार्ट की बिमारी से
    ग्रस्त है
    लेकिन फिर भी
    बेचारा मुझे
    खांसते कराहते हुए
    अपनी पीठ पर लिए फिरता है,
    सोचता हूँ किसी दिन
    जब जेब हरी भरी होगी
    तो इसका भी इलाज
    किसी अच्छे डाक्टर से
    करवाऊंगा!

    बहुत खूब ... स्कूटर के माध्यम से कितना कुछ कह गयी आपकी ये रचना ... जिंदगी का फलसफा कह गयी .

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  10. सभी एक से बढ़कर एक ..बधाई इस बेहतरीन प्रस्‍तुति के लिये ।

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  11. अब तो स्कूटर बनवा लिया है न, अब क्या कहता है वह जरा यह भी तो लिखें !

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  12. जीवन के यथार्थ संघर्ष को बयान करती ...मन को अंतर तक स्पर्श करती रचनाएँ

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  13. wow... bouth he aache shabad likhe hai aapne ... read kar ke aacha lagaa...
    Pleace visit My Blog Dear Friends...
    Lyrics Mantra
    Music BOl

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  14. Very Very nice & beautiful writing....
    Please visit my blog- MAIN AUR MERI KAVITAYEN
    Thanks.....

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  15. सभी एक से बढ़कर एक
    बहुत पसन्द आया
    हमें भी पढवाने के लिये हार्दिक धन्यवाद
    बहुत देर से पहुँच पाया ....माफी चाहता हूँ.

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  16. बढ़िया अंदाज़ है नीलेश ! शुभकामनायें !

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  17. mera scooter vastbikta ke kareeb aam admi ki sachhaiaur pahli tareekh na aaye to achha hai kyonki karzdaron ka munh dekhana padega , sundar abhivyakti badhai

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  18. नमस्कार निलेश जी , पहली बार आपके ब्लॉग पर विचरण किया है , सभी कविताएं बड़े दिल से लिखी जान पड़ती है ,सबसे बढ़िया लगा क्षणिकाओ पर किया गया प्रयोग ,शायद मै ऐसा ना लिख सकू , क्योकि बहुत कम शब्दों का प्रयोग करते हुए अपनी बात कहना आसान नहीं , उम्मीद है ऐसा ही प्रयोग आगे भी करते रहेंगे , बहुत शुभ कामनाये

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NILESH MATHUR

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