Sunday, January 9, 2011

आओ प्रेम करें

जब भी
प्रकृति के करीब जाता हूँ
अपनी जड़ों को
पा जाता हूँ,
पेड़ पौधे
अपने पूर्वज नजर आते हैं मुझे
पर्वतों में
नज़र आते हैं राम,
जल धारा
माँ गंगा सी दिखती है
फूलों में
नज़र आते हैं श्याम,
बादलों में
इन्द्र दिखते हैं
धरती में
नज़र आती अपनी माँ,
कण कण में
नज़र आते हैं शिव
पशु पक्षी लगते जैसे
अपनी ही संतान,
प्रकृति भी हमें
रखती ऐसे
जैसे माँ रखती
अपनी संतान!

मुदिता जी (अहसास अंतर्मन के) की एक टिप्पणी से प्रेरित हो कर लिखी है!


21 comments:

  1. निलेश जी ,
    बहुत सुन्दर अभिव्यक्ति की है आपने.. मैं कृतज्ञ हूँ कि मेरी कही एक सहज सी बात को आपने प्रेरणा बना लिया इस रचना के सृजन के लिए...बहुत गहरायी है इस रचना में ..मंदिर मस्जिद में ईश्वर को खोजने वालों के लिए पथ-प्रदर्शक है यह रचना ...साधुवाद आपको ...

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  2. सही बात है निलेश जी। पर्यावरण ही तो हमारे लिए सबकुछ है। यदि ये नही तो कुछ भी नही। सुन्दर रचना के लिए धन्यवाद। हमारे ब्लाग पर टिप्पणी करने के लिए शुक्रिया।

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  3. देखा नीलेश बाबू!
    मैं न कह्ता था कि आप बस दुनिया को देखने का नज़रिया बदलिये.. दुनिया बदल जाएगी आपके लिये.. एक टिप्पणी और यह कविता... सिम्प्ली ब्यूटीफ़ुल!!आशीर्वाद है भाई!!

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  4. निलेश जी प्रकृति पर इतनी सुंदर रचना ......वाह ....!
    सच है प्रकृति हमें जीवन जीने की कला सिखाती है ....
    बहुत सुंदर भाव ....!!

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  5. सही बात है निलेश जी

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  6. हर शब्‍द में गहराई, बहुत ही बेहतरीन प्रस्‍तुति ।

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  7. बहुत सुन्दर सकारात्मक अभिव्यक्ति है। जब आदमी खुद के पास लौतता है और खुद मे समा जाता है तभी उसे दिव्य प्रेम और अनुभूति का दरशन होता है। शुभकअमनायें।

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  8. अति सुंदर भावभीनी कविता !

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  9. Nice post .
    जनाब को आदाब ! आपके लिए नया साल अच्छा गुज़रे ऐसी हम कामना करते हैं। आपकी फ़ोटो अच्छी लगी।
    हम फ़क़ीरों को महलों ये क्या काम ?
    हम तो बस आप ही को देखा किये।
    हम फ़क़ीरों को यादे मौला के सिवा और चाहिए ही क्या ?
    लेकिन आप ने बनाई है तो पोस्ट को भी सराहना पड़ेगा और है भी अच्छी,
    सचमुच !
    आपकी जिज्ञासाओं को शांत करेगी


    प्यारी मां
    ये लिंक्स अलग से वास्ते दर्शन-पठन आपके नेत्राभिलाषी हैं।
    http://lucknowbloggersassociation.blogspot.com/2010/12/virtual-communalism.html

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    मेरे दिल के हर दरवाज़े से आपका स्वागत है।

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  10. निश्चय ही प्रकृति खुद के अन्दर समावेशित होती है और हम उसमें जो देखना चाहते हैं उसमें वही नज़र आता है

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  11. प्रकृति के करीब जाता हूँ
    अपनी जड़ों को
    पा जाता हूँ,
    पेड़ पौधे
    अपने पूर्वज नजर आते हैं मुझे...

    बेहद नए अंदाज़ में बेहतरीन प्रस्तुति।

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  12. सहीं बात है साहब, अगर किसी को भगावन के दर्शन करने हो, तो उसे प्रकृति को समझाना चाहिए ...
    बहुत अच्छे, लिखते रहिते ...

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  13. बेहतरीन भावाभिव्यक्ति ....साधुवाद..

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  14. कविता का हर एक शब्द बहुत सजगता से प्रयोग किया है ..भाव के अनुकूल शब्द का चयन आपकी लेखन प्रतिभा का परिचायक है ..शुक्रिया आपका

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  15. बहुत सुंदर रचना ........बधाई!
    कभी समय मिले तो हमारे ब्लॉग//shiva12877.blogspot.com पर भी अपनी एक नज़र डालें .

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  16. बेहतरीन रचना। बधाई। आपको नव वर्ष 2011 की अनेक शुभकामनाएं !

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  17. जय श्री कृष्ण...आप बहुत अच्छा लिखतें हैं...वाकई.... आशा हैं आपसे बहुत कुछ सीखने को मिलेगा....!!

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  18. nilesh ji bahut sunder rachna hai.aaj hum inhi jadonse dur hote ja rahe hai........

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  19. Sahaj aur sundar…
    Achchha ye hai ki log ab bhi prakriti ke bare mai etna gahrai se sochte hai …it’s touching !

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NILESH MATHUR

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