Friday, January 14, 2011

दुश्वारियों की ज़िद



खुदा की इबादत भी 
कर के देख चुका मैं 
पर मेरी दुश्वारियों की ज़िद
शुभानअल्लाह !

11 comments:

  1. खुदा की इबादत के बाद 'मैं' बचता ही कहाँ है जनाब ? सुभानअल्लाह!

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  2. dushwariyon ki zidd aur khuda ki ibaadat ... ek din honge zameen aasmaan chaand sitare hathon mein .... koi shak ?

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  3. भाई ख़ुदा की इबादत इसलिये नहीं की जाती कि वो दुश्वारियों से निजात दिलाएगा.. अपना तो एक ही फ़लसफ़ा हैः
    जानकर ये, ख़ुदा से कुछ न कहा
    वो मेरा हाल जानता होगा!!

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  4. बेहतरीन एवं प्रशंसनीय प्रस्तुति ।
    हिन्दी को ऐसे ही सृजन की उम्मीद ।
    धन्यवाद....
    satguru-satykikhoj.blogspot.com

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  5. लगता है, आदमी की दुश्वारियों के आगे ख़ुदा भी लाचार है।

    एक पंक्ति में पूरा जीवन दर्शन,...वाह।

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  6. nilesh ji
    in char panktiyon me aapne sab kuchh kah diya hai badi khoob surati ke saath .
    shubhan -allah
    poonam

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NILESH MATHUR

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