Sunday, October 28, 2012

कब तक चुप रहूँ



देखता हूँ अन्याय
और सहता हूँ जुल्म
गूंगा नहीं हूँ
फिर भी चुप रहता हूँ,

हर तरफ कोहराम है
चौराहे पर बिक रहा ईमान है
अंधा नहीं हूँ
फिर भी आँखें बंद रखता हूँ,


दर्द से चीख रहे हैं
परिंदे, पर्वत, पेड़-पौधे
सुन रहा हूँ चित्कार
फिर भी बहरा बना रहता हूँ।

नफरत के सौदागर
कत्ल करने पर आमाद हैं
इंसानियत का
फिर भी अनजान बना रहता हूँ,

लुट रही है आबरू किसी की
तो बिक रहे हैं जिस्म कहीं
कहने को इंसान हूँ
फिर भी तमाशबीन बना रहता हूँ,

कब तक चुप रहूँ
कब तक सहूँ
पशुओं की तरह जीता रहूँ
या अब इंसान बनूँ।















4 comments:

  1. गहन अभिवयक्ति......

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  2. कब तक चुप रहूँ
    कब तक सहूँ
    पशुओं की तरह जीता रहूँ
    या अब इंसान बनूँ।

    ....बहुत सुन्दर और सटीक अभिव्यक्ति...दिल को छूती रचना..

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  3. hum sab yahi tho karte hain.....bass chup...gehri rachna....soochne par majboor karti rachna

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  4. बहुत सुंदर अभिव्‍यक्ति ..

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NILESH MATHUR

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