Friday, March 2, 2012

कलाकार

अनजान था
दोस्ती से
प्रेम से
अपनत्व से
रिश्तों से
और दुनियादारी से,
अनजान था 
खुद अपने आप से
और अपनों से
दोस्तों से
दुश्मनों से,
अनजान था 
मैं अपनी सोच के स्तर से 
रिश्तों की डोर से
भावनाओं के जोर से
समाज के उसूलों से,
लेकिन अब....
सीख गया हूँ
मैं भी
दुनियादारी,
किस तरह
पीठ में खंजर
भोंकना है,
या किसी की
भावनाओं से खेलना है,
अब मैं भी
रंगमंच का
एक कुशल कलाकार 
बन चुका हूँ!

15 comments:

  1. बहुत दुःख हुआ यह जानकर...

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  2. जो नही सीखना चाहता उसे भी ये दुनिया सिखाकर दम लेती है

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  3. जिन्दगी हमें बहुत कुछ शिखा देती है......

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  4. बहुत खूब .. सीखना ही पडता है

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  5. कलाकार तो बन गए मगर यह कला अच्छी नहीं हैं :)

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  6. भाई, ऐसी दुनियादारी मत सीखो। कम ही लोग तो बचे हैं अच्छे।

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  7. सब कुछ अपने आप ही सिखा देती है जिंदगी ...

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  8. अब मैं भी
    रंगमंच का
    एक कुशल कलाकार
    बन चुका हूँ!

    सार्थक संदेश।
    समय के साथ चलने के लिए स्वयं में परिवर्तन जरूरी है।

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  9. अब मैं भी
    रंगमंच का
    एक कुशल कलाकार
    बन चुका हूँ!

    समय को समझना आवश्यक है भैया ....

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  10. अरे निलेश जी.. ऐसे कलाकार न ही बनें तो बेहतर है..
    क्योंकि ऐसे कलाकारों की कमी नहीं है.. कमी है तो इस रंग मंच पर अपना अलग रुतबा रखने वाले लोगों की..
    पर वो क्या है ना, भेड़-चाल में दुनिया भाग रही है..
    सत्य लिखा है आपने.. पर इस सत्य से बचना है हम सबको..

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  11. अनाड़ी ही बने रहें....
    :-)

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NILESH MATHUR

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