Saturday, February 11, 2012

कबाड़ी की कविता




कबाड़ी हूँ 
खरीदता हूँ बेचता हूँ 
लेकिन शब्दों को 
सहेज कर रखता हूँ
उन्हें तराश कर 
एक नयी शक्ल देने का 
प्रयास करता हूँ ,
मेरा व्यवसाय भी सहायक है मेरा 
कभी कभी हथोड़े की आवाज 
और मजदूर का पसीना भी शब्द देते हैं मुझे 
इंसान का पिघलना तो नहीं लेकिन 
लोहे का गलना अक्सर देखता हूँ,
ट्रक के घूमते  पहिये में 
जीवन की गति देखता हूँ 
और पंचर टायर में  
जीवन का यथार्थ नजर आता है,
टूटे हुए पुर्जों को देखकर
समझ में आता है कि
रिश्तों की तरह 
इन्हें फिर से जोड़ा तो जा सकता है 
लेकिन वो मजबूती फिर नहीं रहती,  
रेल की पुरानी पटरियां 
बताती है मुझे 
कि सहना क्या होता है 
वे घिस तो जाती हैं 
लेकिन टूटना उन्हें नहीं आता, 
छेनी पर हथौड़े की चोट को
और हथौड़ा चलाते हाथों को 
बहुत नजदीक से देखा है मैंने 
मैंने देखी है उन हाथों की मजबूती ,
मैंने देखा है 
उन मजबूत कन्धों को 
जो उठाते हैं खुद से भी ज्यादा भार  
लेकिन झुकते नहीं, 
सचमुच मैं कबाड़ी हूँ 
हर पुरानी चीज की 
कद्र जानता हूँ 
पुराने रिश्तों को निभाता हूँ 
पुराने दोस्तो को पहचानता हूँ,
हाँ मैं कबाड़ी हूँ 
सब कुछ खरीद
और बेच सकता हूँ 
सिर्फ ईमान को छोड़ कर । 

8 comments:

  1. Truck ke ghumte pahiye me jeewan ki gati,aur puncture tyre me jeewan ka yatharth,
    PAR AAPNE TO HAR JAGAH JEEWAN KE HAR PAHLOO KO DEKH LIYA
    ACHHI RACHNA SARTHAK PRASTUTI

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  2. और बेच सकता हूँ
    सिर्फ ईमान को छोड़ कर ।

    यही सबसे कीमती है ....
    शुभकामनायें आपको, नीलेश !

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  3. नये प्रतीकों से रचित भावपूर्ण रचना आभार .

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  4. This comment has been removed by a blog administrator.

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    1. माफी चाहता हूँ गलती से आपका कमेंट डिलीट हो गया है।

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  5. क्या शानदार कबाड़ी की कविता है। कबाड़ा का तो पता नहीं दिल्ली के मायापुरी के लोहा मंडी में लोहे पर पड़ते हथोंडों और हथोंड़ों पर गिरने वाली पसीने की बूंदे याद आ गईं....पिघलता लोहा और न पिघलते इंसान...(इंसान कहना मजबूरी है) घुमता ट्रक का पहिया औऱ गतिमान समय का चक्र सब एकाकार हो गए हैं.....वाह आवारा बिरादर

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  6. पसीने से लथपथ मजदूर ईमान नहीं बेचता

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  7. माफी चाहता हूँ गलती से सुषमा जी का कमेंट डिलीट हो गया है।

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NILESH MATHUR

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