Tuesday, June 28, 2011

भूल कर मुस्कुराना

ना जाने क्या हुआ है 
आज इंसान को
भूल कर  मुस्कुराना
ओढ़ ली है 
चादर विषाद की,
किसी को डर है
मर जाने का 
तो कोई जिन्दा लाश 
बना फिरता है,
तिजोरियों में 
बंद है मुस्कान
लबों पे ताले जड़े हैं
रातें अक्सर 
बीत जाती हैं
करवटें बदलते हुए,
कोई शिखर से 
फिसल कर 
औन्धे मुँह गिरा है
ज़मीन पर 
तो कोई
माथे पर सलवटें लिए
शिखर पर 
चढ़ने को बेताब है,
कोई भूख से बेहाल है
तो किसी को  
बदहजमी की शिकायत है,
कोई पी रहा है 
ग़मों को घोल कर
शराब में   
तो किसी को
फिक्र है 
मुरझाये हुए गुलाब की,
ना जाने क्या हुआ है 
आज इंसान को
भूल कर मुस्कुराना
ओढ़ ली है 
चादर विषाद की!

17 comments:

  1. माथे पर सलवटें लिए
    शिखर पर
    चढ़ने को बेताब है,
    सही बात अक्सर ऐसा होता है

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  2. ना जाने क्या हुआ है
    आज इंसान को
    भूल कर मुस्कुराना
    ओढ़ ली है
    चादर विषाद की.....its true...?

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  3. ना जाने क्या हुआ है
    आज इंसान को
    भूल कर मुस्कुराना
    ओढ़ ली है
    चादर विषाद की!kyonki andar me rah gai hai sirf bhautik chaah

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  4. सच बयान करती हुई खुबसुरत रचना। आभार।

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  5. सटीक रचना ... अच्छी अभिव्यक्ति

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  6. ना जाने क्या हुआ है
    आज इंसान को
    भूल कर मुस्कुराना
    ओढ़ ली है
    चादर विषाद की,
    .....bahut sundar abhivyakti...utkrist rachna.

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  7. ना जाने क्या हुआ है
    आज इंसान को
    भूल कर मुस्कुराना
    ओढ़ ली है
    चादर विषाद की...सही कहा आप ने...सुन्दर अभिव्यक्ति....

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  8. मुस्काने के सपने भी नहीं आते आजकल ...सच है आपकी रचना में

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  9. गुरु ऑफ जॉय से मिलने के बाद भी यह शिकायत !

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  10. सुन्दर भाव और अभिव्यक्ति के साथ ज़बरदस्त रचना! हर एक पंक्तियाँ लाजवाब लगा! बधाई!

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  11. बदला
    बदली फितरत
    बदल गई है
    मुस्कराहट उसकी

    anu

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  12. इन्सान बदला
    बदली फितरत
    बदल गई है
    मुस्कराहट उसकी

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  13. हम खुद हँसना भूल गए हैं और हंसाने का तो सवाल ही नहीं पैदा होता !
    शुभकामनायें नीलेश !

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  14. हाँ बताओ तो ऐसा क्यों है?लिखी तो बात सच्ची है पर....जवाब भी तुम ही जानते हो.

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NILESH MATHUR

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