Sunday, June 5, 2011

मेरा जीवन

जी रहा हूँ
दुनिया में
कुछ इस तरह 
जैसे जाड़े की 
एक सर्द रात में 
किसी ने  
मेरा कम्बल  
मुझसे छीन लिया हो 
और मैं गठरी बना  
दुबका रहा  
बिस्तर में ,
या कुछ इस तरह 
जैसे तपती दुपहरी  
नंगे पैर 
मरुस्थल की सैर!

18 comments:

  1. bahut hi gaharai liye hue saarthak rachanaa.badhaai aapko.

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  2. बहुत सुन्दर अभिव्यक्ति

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  3. किसी एहसास का हद से गुज़र जाना ....!!
    बहुत सुंदर रचना ..!!

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  4. सुन्‍दर शब्‍दों के साथ भावों का बेहतरीन संयोजन ...
    http://sanjaybhaskar.blogspot.com/

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  5. कई दिनों व्यस्त होने के कारण ब्लॉग पर नहीं आ सका

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  6. हां, ज़िंदगी उसी तरह की है जैसा आपने लिखा है...कभी सर्द, कभी गर्म।

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  7. मेरे ब्‍लाग पर आपके आगमन का धन्‍यवाद ।
    आपको नाचीज का कहा कुछ अच्‍छा लगा, उसके लिए हार्दिक आभार

    आपका ब्‍लाग भी अच्‍छा लगा । बधाई

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  8. जीना इसी का नाम है ...
    सुन्दर अभिव्यक्ति..!!

    ***punam***
    bas yun..hi..

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  9. नीलेश जी......
    बहुत प्यारी भावनाएं हैं इस कविता में....
    जी रहा हूँ
    दुनिया में
    कुछ इस तरह
    जैसे जाड़े की
    एक सर्द रात में
    किसी ने
    मेरा कम्बल
    मुझसे छीन लिया हो
    बहुत सुन्दर.... बहुत अभिनव.

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  10. सुन्दर भाव सुन्दर अभिव्यक्ति ....

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  11. waha bahut khub....chhoti par bhavprun abhivykati

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  12. कल 06/09/2011 को आपकी यह पोस्ट नयी पुरानी हलचल पर लिंक की जा रही हैं.आपके सुझावों का स्वागत है .
    धन्यवाद!

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  13. बहुत भावपूर्ण रचना |
    आशा

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  14. बेहतरीन भावमय प्रस्‍तुति ।

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  15. लाजवाब रचना...
    सादर...

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NILESH MATHUR

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