Tuesday, June 8, 2010

अतीत के आसमान से

आज बरसों बाद 
छत पर लेटकर तारों को देखा 
और चाँद को 
निहारता रहा देर तक, 


अतीत के आसमान में 
आज फिर से 
सपनों का चाँद 
बादलों की ओट से झांकता नज़र आया,


चाँद मुझ से शर्मा रहा था 
या मैं चाँद से 
कहना कठिन था 
कभी वो बादलों में मुह छुपाता था 
कभी मैं लिहाफ में,


आज वो मुझे आईना दिखा रहा था 
जिसमे मेरा अतीत नज़र आ रहा था 


तारों में नज़र आया मुझे 
मेरा वो मित्र गज्जू 
जो सदा के लिए हमें छोड़ कर जा चुका था 
और मैं सिर्फ एक दिन जिसके लिए रोया था,


और  नज़र आये मुझे 
मेरे बचपन के वो मित्र 
जिन्हें आज मैं अपना मित्र कहने में शर्माता हूँ, 


तारों के पीछे आसमान में 
मेरे अतीत के वो अध्याय भी नज़र आये थे मुझे 
जिन्हें मैं खुद से भी छुपाता हूँ ,


लेकिन अचानक ही न जाने कहाँ से 
बादलों का एक आवारा झुंड 
आसमान में छाया और बरसने लगा,


शायद उन्हें भी ये कबूल न था 
कि मुझ सा खुदगर्ज ईन्सान 
तारों को देखे या चाँद को निहारे 
और फिर से जिंदा कर ले 
अपने मरे हुए ज़मीर को!

19 comments:

  1. विवेक जी,बहुत बेहतरीन रचना है। भावों को बहुत गहरे तक उतार कर शब्दों से सजाया है।बहुत सुन्दर!!

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  2. और दिल्ली में ये आवारा आ गए है

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  3. भावनाओं में डूबी रचना ...

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  4. तारों में नज़र आया मुझे
    मेरा वो मित्र गज्जू
    जो सदा के लिए हमें छोड़ कर जा चुका था
    और मैं सिर्फ एक दिन जिसके लिए रोया था,

    ........बहुत बेहतरीन रचना

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  5. सुन्दर भाव पूर्ण रचना !

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  6. गहरी बात .. इंसान इतना ख़ुदग़र्ज़ है की अपने अतीत को भी अपने आईने में देखना चाहता है .. कवि की ईमानदारी अच्छी ल्गी ...

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  7. aasan se shabdon me bht gahrayi wali aur sachchi baat kah di aapne....jinda karle apne mare hue jameer ko........wonderful line......namumkin nhi apne mare hue jameer ko jinda kar pana...par tab thoda muskil ho jata hain jab koi samajh hi nhi pata na jaan pata hain ki uska jameer mar chuka hain...

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  8. ईमानदार आत्माभिव्यक्ति है... प्रकृति माँ है, जिसके गोद में इंसान अपने आप से धोखा नहीं कर सकता है...चाहे केतना भी रजाई ओढ लीजिए, सच से भागना बहुते मुस्किल है...

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  9. संवेदनशील रचना...

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  10. अच्छी भावपूर्ण रचना..... बहुत सुंदर !!!

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  11. बहुत सुंदर !
    कविता को एक नए अंदाज़ में परिभाषित किया है आप ने !

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  12. अच्छी रचना.....

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  13. aatmmanthan ka bodh jhalakata haiise rachana me.......aatmchintan kai var ateet kee khalan dikha hee deta hai.........
    dil se likhee rachana bahut pasand aaee .

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  14. तारों के पीछे आसमान में
    मेरे अतीत के वो अध्याय भी नज़र आये थे मुझे
    जिन्हें मैं खुद से भी छुपाता हूँ ,
    yah satya jane kitnon ke saath chalta hai

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  15. atmvishleshn ka madyam tare aakash badlo ka barsna bhut kuchh kh gye .
    achhi rachna

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  16. बेहद प्रभावशाली प्रस्तुति किस किस बात की तारीफ करूँ बस बेमिसाल..... लाजवाब.......

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  17. प्रकृति और भावनाओं का अनोखा संगम है आपकी यह रचना।

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NILESH MATHUR

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