सोचो
क्या होता
अगर तुम ना होते,
क्या शहर की गलियाँ
वीरान हो जाती
या नुक्कड़ पे जमघट ना होता,
क्या शराब ना होती
या मयखाने बंद हो जाते,
क्या सूरज पश्चिम से निकलता
या नदियाँ सूख जाती,
क्या फूल नहीं खिलते
या पत्ते मुरझा जाते,
क्या कोई नहीं मुस्कुराता
या कोई जश्न नहीं मनाता,
तुम्हारे होने या ना होने से
क्या फर्क पड़ता है,
सब कुछ इसी तरह चलता
सिर्फ तुम ना होते।
सही है
जवाब देंहटाएंबेहद खूबसूरत रचना
जवाब देंहटाएंयह कविता बहुत सीधे सवाल करती है और मन को ठहरने पर मजबूर कर देती है। पढ़ते हुए ऐसा लगा जैसे कोई खुद से ही बात कर रहा हो। बड़े बदलावों की जगह आपने छोटे, रोज़मर्रा के उदाहरण दिए हैं, जो बात को और गहरा बना देते हैं।
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