Thursday, April 3, 2014

क्षणिकाएँ



1.
गंगा में डुबकी लगाई
पापों से मुक्ति पायी ,
फिर शुरू होंगे
नए सिरे से अनवरत पाप!

2.
हर कि पौडी
हर लेती हर पाप
और हम
फिर से तरोताजा
और पाप करने को !

3.
खुदा की इबादत भी
कर के देख चुका मैं
पर मेरी दुश्वारियों की ज़िद
शुभानअल्लाह !

4.
जब हताश हो उठता है मन
तो बेजान पत्थरों में
नज़र आती है उम्मीद कि किरण
और फिर पूजने लगते हैं
पत्थरों को देवता बनाकर!


6 comments:

  1. satya ka saccha roop ...shabdon ke maadhayam se ...bata diya .......lajavaab ....

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  2. ईश्वर और धर्म की आड लेकर यही तो चलता है अधिकतर ..। यह एक कडवा सच है हमारी आस्तिकता का । आरती पूजा करते समय या गंगा में स्नान करते समय जो आस्था होती है अगले ही पल विलुप्त होजाती है 'मरघट-चेतना' की तरह ।

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  3. ईश्वर और धर्म की आड लेकर यही तो चलता है अधिकतर ..। यह एक कडवा सच है हमारी आस्तिकता का । आरती पूजा करते समय या गंगा में स्नान करते समय जो आस्था होती है अगले ही पल विलुप्त होजाती है 'मरघट-चेतना' की तरह ।

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  4. हमारी परवरिश का ही दोष है भाई कि हमें अच्छा बुरा में अंतर बताने के स्थान पर वर्जनाएँ दी जाती हैं और यह भी घुट्टी में पिलाया जाता है कि यह "पाप" है और उससे मुक्ति का यह उपाय है... जब उपाय मौजूद हो तो पाप सहज हो जाता है. मन्दिर में प्रसाद चढाया, कनफेशन रूम की तनहाई में माफ़ी माँग ली, मज़ार पे चादर चढा दी या गुरुद्वारे में मत्था टेक लिया. धुल गये पाप!!
    आस्था, अनास्था और व्यावहारिकता की ज़मीन पर अच्छी अभिव्यक्ति!!

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  5. ..एक से एक गहरे अर्थो वाली पंक्तिया .....!!

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  6. पाप धोने का मौसम तो खूब बढ़कर बोल रहा है इस चुनावी माहौल में.. बढ़िया रही!

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NILESH MATHUR

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