Wednesday, August 31, 2011

ना शिकवा है कोई, ना शिकायत



आब-ऐ-आतीश बन
ता- उम्र
जलाया था
जिसने मुझे,
मुड के देखा मैंने
उस ज़िन्दगी को,
मुस्कुरा रही थी 
ज़िन्दगी
मुझे देख कर,
और मैं भी
मुस्कुरा रहा था
छुपा कर
अपने जख्मों के निशान 
जो दिए थे उसने,
ना शिकवा है कोई
ना शिकायत ज़िंदगी से
क्योंकि 

जख्म तो दिये थे उसने
पर जख्मों की मरहम भी
उसी ने की थी ।

Thursday, August 25, 2011

महाबली अन्ना

महाबली अन्ना 


महाबली अन्ना का वार 


अहिंसा का हथियार


होशियार सरकार होशियार 


जाग गयी है जनता


अब खत्म हो भ्रष्टाचार ।



                                                           




Monday, August 22, 2011

शूरवीर अन्ना

शूरवीर अन्ना
निकल पड़े
ब्रह्मास्त्र लिए
रण के मैदान में,
ये युद्ध है
भ्रष्टाचार के विरुद्ध,
सवा करोड़ की सेना देख
दहल उठा है
सत्ता पक्ष
और दहल उठे
सब भ्रष्टाचारी,
अन्ना ने किया है युद्धघोष
अब उठना होगा
हमें चिरनिद्रा से,
और दिखाना होगा
कि हमारी रगों में
अब भी
बहता है खून पानी नहीं!

Tuesday, August 9, 2011

वर्ष २१०० की एक कविता



इंडियन आयल की तरंग पत्रिका में इंग्लिश में लिखा हुआ कुछ इस तरह का पढ़ा था जिस से प्रेरित हो कर ये पंक्तियाँ लिखी हैं...


आज अपनी पचासवीं सालगिरह पर 
अस्सी साल का वृद्ध दिख रहा हूँ
और खुद को अस्सी का ही 
महसूस भी कर रहा हूँ
लेकिन फिर भी खुशकिस्मत हूँ
आज बहुत कम लोग हैं जो
पचास को पार करते हैं,


मुझे याद है
जब मैं छोटा था
बगीचों में बहुत से पेड़ 
और घरों में बगीचे हुआ करते थे 
झरने और नदियाँ बहा करती थी
रिमझिम बारिश हुआ करती थी,


मुझे याद हैं
बचपन में मैं बहुत सारे पानी से
नहाया करता था
लेकिन आज भीगे हुए तौलिये से
बदन पौंछता हूँ
अपनी पचासवीं सालगिरह पर
मेरी पेंसन का एक बड़ा हिस्सा
सिर्फ पानी खरीदने में खर्च होता है
फिर भी जरुरत जितना नहीं मिलता,


मुझे याद है
मेरे पिता अस्सी की उम्र में भी
जवान दिखा करते थे
पर आज तो बीस वर्ष का युवा भी
चालीस का दिखता है
और औसत उम्र भी तीस की हो चुकी है,


आज अपनी पचासवीं सालगिरह पर
मैं अपने बेटे को
हरे भरे घास के मैदान
खूबसूरत फूलों
और उन रंग बिरंगी मछलियों की 
कहानियाँ सुना रहा हूँ 
जो नदियों में तैरा करती थी
बता रहा हूँ उसे 
की आम और अमरुद नाम के
फल हुआ करते थे,


आज अपनी पचासवीं सालगिरह पर
मैंने और मेरी पीढ़ी ने
पर्यावरण के साथ 
जो खिलवाड़ किया था 
उसके लिए शर्मिंदा हूँ
जल्द ही शायद इस धरा पर
जीवन संभव नहीं होगा
और इसके जिम्मेदार होंगे 
मैं और मेरी पीढ़ी!

Sunday, August 7, 2011

मेरे मित्र





गज्जू , मेरे दोस्त बहुत याद आते हो तुम....

 स्वर्गीय मित्र गजेन्द्र सिंह के साथ 
(1)

मेरे मित्र  
आज फिर से 
तुम्हारी याद आई
आँखें कुछ नम हुई 
और विगत स्मृतियों ने
बहुत रुलाया,

ख्यालों ही ख्यालों में सोचता हूँ 
कि तुमसे जब मुलाकात होगी 
तो बहुत सी बातें करूँगा
कुछ शिकवे कुछ शिकायत करूँगा,

पर ख्यालों की ये दुनिया
बड़ी बेरहमी से मुझे
यथार्थ के धरातल पर ले आती है
और ये अहसास कराती है
कि तुम तो वहां जा चुके हो 
जहाँ फ़रिश्ते रहते हैं,

पर मेरा विश्वास कहता है 
कि तुम वहां भी 
मुझे याद करते हो
तभी तो
आज भी तुम 
मेरे आस पास रहते हो!


(2)
हमने तो सोचा था 
सदा रहेगा साथ
तुम बीच राह 
छोड़ चले,

रेत की तरह 
फिसल गए हाथों से 
हम हाथ मलते रहे,


तुम जहाँ भी रहो
रोशनी दिखाना हमें 
अंधेरों से घिर गए हैं हम ,


सहेज कर रखा है 
मैंने उन सुनहरे पलों को 
जब हम गले लगा करते थे
मैं अपनी कहता था
तुम अपनी सुनाते थे,


पर अब 
किससे वो बातें करूँ
और किसको गले लगाऊँ !


Wednesday, August 3, 2011

भीड़ में अकेला

एक दिन मैं 
अपने सारे उसूलों को 
तिजोरी में बंद कर 
घर से खाली हाथ निकलता हूँ 
और देखता हूँ कि अब मैं 
भीड़ में अकेला नहीं हूँ,
अब मुझे 
दुनियादारी का कुछ सामान 
बाज़ार से खरीदना होगा
और अपने अंतर को
उससे सजाना होगा,
या फिर 
भीड़ में अकेले चलने का 
साहस जुटाना होगा!
NILESH MATHUR

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