Thursday, October 14, 2010

आज फिर से

आज फिर से
उठ रही है
सीने में दर्द की इक लहर,


आज फिर से
आँखें नम हो रही है
और दिल उदास है,


आज फिर से
माथे पर सलवटें है
और चेहरे पर विषाद है,


आज फिर से
मेरी भावनाओं से
खेला जा रहा है,


आज फिर से 
मेरे ज़ज्बातों को
कुचला जा रहा है,


आज फिर से
कोई सपना
टूट कर बिखरता जा रहा है,


आज फिर से
मैं खुद से दूर
हुए जा रहा हूँ,\


आज फिर से 
वो दाड़ी वाला याद आ रहा है
और ऊँगली दिखा रहा है 
जिसकी तस्वीर 
कल रात को पीते समय
मैंने घुमा कर रख दी थी,  
आज फिर से........................

15 comments:

  1. सीखो जीने की कला
    वही तो सिखाता है वो तुम्हें
    आज ही क्यों
    कल भी और हर आने वाले कल को भी
    उठो, जागो और चल दो
    कल को भुलाकर
    आज फिर से "आज" खड़ा है तुम्हारे द्वार पर!!

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  2. peete samay............
    ye shavd peeda de jate hai...........
    ye shouk kab aadat ban insaan ko peene lagta hai isakee khabar bhee nahee hotee......
    Anytha na le..........jo galat lagta hai batane me jhijhakatee nahee....

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  3. आज फिर से
    आँखें नम हो रही है
    और दिल उदास है,

    ---

    Very touching lines...

    just get going Nilesh ji.

    .

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  4. ओह,...कविता का दर्द या दर्द की कविता...शब्दों को चुन-चुन कर तराशा है आपने ...प्रशंसनीय रचना।

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  5. निलेश बाबू,
    ज़िंदगी को सीरियसली मत लीजिये, खुश रहिये!
    और दारू मत पीजिये!
    आशीष
    --
    प्रायश्चित

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  6. भावो का सुन्दर चित्रण्।

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  7. अब ये तो बताइए पीते वक़्त तस्वीर क्यों घुमाई थी .....??

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  8. @ हीर जी, आप खुद ही देखिये वो किस तरह ऊँगली दिखा रहे हैं, उनके सामने पीने में डर लगता है!

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  9. कोई और नहीं आप स्वयं ही स्वयं से दूर हैं !

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  10. lekin ye dadhiwala tasweer ghumane ke baad bhi ungalee dikhata hai..bhale hi peene ke waqt aapki ankhe band ho....uski ankhen to her waqt ,her jagah saath rahti hain...fir tasweer ghumane se kya hoga bhai ...tasweer samne rakh ke piyo na.....by the way ...kavita laazwab hai.ek ehsaas bhare maan ki paresaaniyan kuch eisi hi hongi...lekin jab dadhiwala ho saath to fir kya baat!!!!!!!!

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NILESH MATHUR

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