Tuesday, June 15, 2010

प्रेम क्या है?

एक सवाल.........


प्रेम क्या है?
धोखा, फरेब या वफ़ा है,
या किसी की रगों में बहता
नशा है!

Sunday, June 13, 2010

मैं कौन हूँ?

एक प्रश्न 
अक्सर मैं करता हूँ खुद से  
कि मैं कौन हूँ?

अपने अस्तित्व की तलाश में
खुद अपने आप से अपरिचित
हैरान होता हूँ मैं
खुद के मैं पर,

जीने के बहाने ढूंढ़ते हुए भी
मेरा मैं
अस्तित्वहीन सा खड़ा है
सिर उठा कर,

और मैं
मेरे मैं की परतें उधेड़ता हुआ
उलझता जाता हूँ
अपने ही प्रश्न के जाल में!

Friday, June 11, 2010

मेरी रचनाओं को सराहो मत

कोई उठाता है उँगलियाँ 
मेरी रचनाओं पर 
तब दिल तो जलता है
पर मेरा हौसला
और भी बुलंद हो जाता है,

इसलिए लोगों 
मेरी रचनाओं को सराहो मत
उनका पोस्टमार्टम करो
शायद मरने का कारण
तुम्हे पता चल जाए,

और जब तुम्हें पता चल जाए 
तो मुझे ज़रूर बताना
मैं इन्हें बार बार मरते हुए 
नहीं देख सकता,

हो सकता है कि
मेरी ये रचनाएँ रद्दी का पुलंदा हो,

पर मैं क्या करूँ
मेरी लेखनी मेरे वश में नहीं रहती,

अक्सर छटपटाती रहती है वो
कुछ लिखने को,

मेरी लेखनी नहीं जानती
कि वो जो लिख रही है
उससे कोई आहत हो सकता है
या वो किसी आलोचक कि
गोली का शिकार हो सकता है!

'अब अपनी औकात में रहने लगी है वह' (वाणीगीत) पर आई टिप्पणियों को समर्पित!

Tuesday, June 8, 2010

अतीत के आसमान से

आज बरसों बाद 
छत पर लेटकर तारों को देखा 
और चाँद को 
निहारता रहा देर तक, 


अतीत के आसमान में 
आज फिर से 
सपनों का चाँद 
बादलों की ओट से झांकता नज़र आया,


चाँद मुझ से शर्मा रहा था 
या मैं चाँद से 
कहना कठिन था 
कभी वो बादलों में मुह छुपाता था 
कभी मैं लिहाफ में,


आज वो मुझे आईना दिखा रहा था 
जिसमे मेरा अतीत नज़र आ रहा था 


तारों में नज़र आया मुझे 
मेरा वो मित्र गज्जू 
जो सदा के लिए हमें छोड़ कर जा चुका था 
और मैं सिर्फ एक दिन जिसके लिए रोया था,


और  नज़र आये मुझे 
मेरे बचपन के वो मित्र 
जिन्हें आज मैं अपना मित्र कहने में शर्माता हूँ, 


तारों के पीछे आसमान में 
मेरे अतीत के वो अध्याय भी नज़र आये थे मुझे 
जिन्हें मैं खुद से भी छुपाता हूँ ,


लेकिन अचानक ही न जाने कहाँ से 
बादलों का एक आवारा झुंड 
आसमान में छाया और बरसने लगा,


शायद उन्हें भी ये कबूल न था 
कि मुझ सा खुदगर्ज ईन्सान 
तारों को देखे या चाँद को निहारे 
और फिर से जिंदा कर ले 
अपने मरे हुए ज़मीर को!

Wednesday, June 2, 2010

कोई बचा लो मुझको मर रहा हूँ मैं

दीपक 'मशाल' जी के सुझाव पर अपनी इस रचना में कुछ पंक्तियाँ और जोड़ कर प्रस्तुत कर रहा हूँ.....

कोई बचा लो मुझको
मर रहा हूँ मैं
एक बार में मरता तो अलग बात थी 
किस्तों में मर रहा हूँ मैं,

पहले ज़मीर मरा
फिर इंसानियत
अब तिल तिल कर 
मर रही है मेरी संवेदनाएं,

कहते हैं की 
जब संवेदनाएं मरती हैं 
तो हैवानियत का 
जन्म होता है,

और हैवान अक्सर 
ज़मीर और इंसानियत जैसी 
वाहियात चीजो में 
यकिन नहीं करते
और वो संवेदनाओं से परे होते हैं,

यही तो फर्क होता है
इंसान और हैवान में,

इसीलिए तो कहता हूँ  कि
कोई बचा लो मुझको 
मर रहा हूँ मैं
इंसान से हैवान बन रहा हूँ मैं!

अगर तुम 
मुझे बचा नहीं सकते
तो फिर मुझे दोष भी मत देना
क्योंकि मैं खुद को
मरते हुए 
और इंसान से हैवान बनते हुए 
देख रहा हूँ, 

लेकिन मैं मरना नहीं चाहता,

इसी लिए तो कहता हूँ कि 
कोई बचा लो मुझको 
मर रहा हूँ मैं
इंसान से हैवान 
बन रहा हूँ मैं!

कोई बचा लो मुझको मर रहा हूँ मैं



कोई बचा लो मुझको
मर रहा हूँ मैं
एक बार में मरता तो अलग बात थी 
किस्तों में मर रहा हूँ मैं,


पहले ज़मीर मरा
फिर इंसानियत
अब तिल तिल कर 
मर रही है मेरी संवेदनाएं,


कोई दे दे दवा 
या दारू ही सही
नशे में जान निकले 
तो अच्छा,


अगर बदकिस्मती से 
मैं बच गया 
तो क्या तुम मुझे 
इंसान कहोगे?



NILESH MATHUR

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